मंगलवार, 27 मई 2025

Laghu-Kathayen : Trilok Singh Thakurela

 

पिताजी एक माह से बीमार थे। उनके व माँ के कई बार फोन आ चुके थे , किन्तु मैं गाँव नहीं जा पाया। सच कहूँ तो मैं छुट्टियाँ बचने के मूड में था। उमा का सुझाव था - ''बुखार ही तो है, कोई गम्भीर बात तो है नहीं। दो माह बाद दीपावली है , तब जाना ही है। अब जाकर क्या करोगे। सब जानते हैं कि हम सौ किलोमीटर दूर रहते हैं। बार बार किराया खर्च करने में कौन सी समझदारी है। ''


एक दिन माँ का फिर फोन आया। माँ गुस्से में थी - '' तेरे पिताजी बीमार हैं और तुझे आने तक की फुर्सत नहीं। वह बहुत नाराज हैं तुझसे। कह रहे थे कि अब तुझसे कभी बात नहीं करेंगे। ''
उसी दिन ड्यूटी जाते समय मुझे ऑटो रिक्शा ने टक्कर मार दी। मेरे बायें पेअर पर प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।

उमा ने माँ को फोन कर दिया था। दो घंटे में ही पिताजी हॉस्पीटल में आ पहुँचे। वह बीमारी की वजह से बहित कमजोर किन्तु दृढ थे। मुझे सांत्वना देते हुए बोले - '' किसी तरह की चिंता मत करना। थोड़े दिनों की परेशानी है। तू जल्दी ही ठीक हो जायेगा।
उन्होंने मुझे दस हजार रुपये थमाते हुए कहा - '' रख ले , काम आयेंगे। ''
मैं क्या बोलता। मुझे स्वयं के व्यवहार पर शर्म आ रही थी।
जीवन के झंझावात में पिताजी किसी विशाल चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े थे।

हरा दुपट्टा

रेलगाड़ी में उस दिन कुछ ज्यादा ही भीड़ थी, इसलिए सरोज को खड़े होकर यात्रा करनी पड़ रही थी । उसे दो स्टेशन बाद ही उतरना था। उसके पास ही अपने चार बच्चों के साथ बुर्के में एक महिला बैठी थी।

बुर्के बाली महिला की नज़र सरोज गयी तो लगा कि वह उसे पहचानने की कोशिश कर रही है। बुर्के वाली महिला ने सरोज को अपने पास बुलाते हुए सीट पर जगह दी। फिर पूछा कि 'क्या तुम सरोज हो। '

सरोज ने 'हाँ ' में सर हिलाया तो वह सरोज से लिपट गयी। बुर्का हटाते हुए उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी -- '' सरोज ,बहुत सालों बाद मिली हो। कैसी हो ? शादी हो गयी ? अंकल आंटी कैसे हैं ?''
देखते ही सरोज भी खुशी से झूम उठी - '' रूबिया , तुम ?''
'' हाँ , सरोज '' रूबिया ने कहा।
''अरे , तुम अचानक कहाँ गायब हो गयीं थीं ? कालेज छोड़ने के बाद तुम्हारी कोई खोज खबर ही नहीं मिली। ''
'' सरोज , अब्बा दंगों की भेंट चढ़ गये तो हमने शहर ही छोड़ दिया और अपने अंकल के पास सूरत चले गये। अब अम्मी भी नहीं रहीं। ''
'' रूबिया, बहुत दुःख हुआ। बीस साल में मैं तुम्हें कभी नहीं भूली। तुम्हारी याद बराबर आती रही। ''
''तो मैं भी तुम्हें कब भूल पायी , सरोज। तुम्हारा दिया दुपट्टा हमेशा अपने पास रखती हूँ। ''
यह कहकर रूबिया ने अपने छोटे से बैग से हरा दुपट्टा निकाला और हवा में लहरा दिया। यह दुपट्टा वर्षों पूर्व सरोज ने रूबिया को दिया था।
ख़ुशी के अतिरेक में थोड़ी देर के लिए दोनों नि:शब्द हो गयीं। आत्मीयता की गंध हरे दुपट्टे से निकलकर पूरे कम्पार्टमेंट में फ़ैल चुकी थी।

मौन

रघुराज सिंह बहुत खुश थे । उनके लड़के से अपनी लड़की का रिश्ता करने की इच्छा से अजमेर से एक संपन्न एवं सुसंस्कृत परिवार आया था । रघुराज सिंह का लड़का सेना में अधिकारी है । उनके तीन अन्य लड़के उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

लड़की के पिता ने रघुराज सिंह से कहा -- '' हम आपसे एवं आपके परिवार से पूरी तरह संतुष्ट हैं। आप भी हमारी लड़की को देख लें एवं हमारे परिवार के बारे में पूरी जानकारी कर लें । ''
रघुराज सिंह ने कहा - '' जानकारी लेने की कोई जरुरत नहीं है। हम भी आपसे पूरी तरह संतुष्ट है। ''
लड़की के पिता ने पूछा - '' आपकी कोई मांग हो तो हमें बताने की कृपा करें। ''
रघुराज सिंह बोले - '' हमारी कोई मांग नहीं है। बस, चाहते हैं , लड़की ऐसी हो जो परिवार में विघटन न कराये। चाहता हूँ, चारों भाई मिलकर रहें। ''
'' इससे बढ़कर क्या बात हो सकती है। जब बच्चों को अच्छे संसार मिलते हैं तो पूरा परिवार एक सूत्र में बंधा रहता है। '' लड़की के पिता ने विनम्रतापूर्वक कहते हुए पूछा -
'' साहब, आप कितने भाई हैं ? ''
रघुराज सिंह ने कहा - '' सात भाई, एक बहिन ''
लड़की के पिता ने पूछा - '' आपके भाई क्या करते हैं ? ''
रघुराज सिंह - '' सबके निजी धंधे हैं। ''
लड़की के पिता ने पूछा - '' आपने अपने किसी भाई को बुलवाया नहीं ? ''
रघुराज सिंह झिझकते हुए बोले - '' अजी , हम भाइयों में बोलचाल बंद है। ''
अचानक वहां खामोशी छ गयी। प्रश्न और उत्तर दोनों ही मौन थे।

दोहरा चरित्र

शोभना मृदुभाषिणी एवं आकर्षक व्यक्तित्व की महिला है। वह राजनीति की सफल खिलाड़ी है। उसके भाषणों में महिला एवं बाल विकास प्रमुख विषय रहता है। वह महिलाओं की प्रबल पक्षधर के रूप में जानी जाती हैं।

एक दिन वह अपनी पुत्र-वधू के साथ डॉक्टर बत्रा के क्लीनिक पर पहुँची। पुत्रवधू भ्रूण की जांच कराई तो पता चला कि वह एक कन्या है। शोभना ने डॉक्टर बत्रा से गर्भपात कराने की बात की तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछ लिया - '' शोभना जी, आप तो महिला हितों की प्रबल पक्षधर हैं, फिर कन्या - भ्रूण को क्यों गिराना चाहती हैं ? ''

शोभना ने बड़ी ढिठाई से कहा- '' छोड़िये , डॉक्टर साहब, भाषणों की बात और है। अपने घर का हिसाब तो देखना पड़ता है। ''
डाक्टर बत्रा शोभना के दोहरे चरित्र को देखकर हतप्रभ थे।

ढोंग

कालू मोची की इकलौती संतान चम्पा सोलह वर्ष की हुई तो उसके शरीर में एक अलग ही आकर्षण पैदा हो गया। ठाकुर रूद्र प्रताप सिंह उस पर आसक्त हो गए। आँखों आँखों में ठाकुर साहब ने प्रेम का इजहार किया। नादान चम्पा झांसे में आ गयी। वे अक्सर खेतों में मिलने लगे।

गर्मियों के दिन थे। ठाकुर रूद्र प्रताप सिंह की पत्नी बच्चों को लेकर पीहर गयी हुई थी।
एक दोपहर चम्पा ठाकुर साहब के घर पर आ गयी।

रूद्र प्रताप सिंह रसोई में थे। चम्पा रसोई में चली आयी। रूद्र प्रताप सिंह को अच्छा नहीं लगा। नाराजगी से बोले - '' चम्पा रसोई में क्यों चली आयी ? क्या यह भी भूल गयी कि तू मोची है ? ''

चम्पा आहात हुई। बोली - '' सुना है, आत्मा की कोई जाति नहीं होती। यदि शरीर मोची है , तो इसे आप कई बार छू चुके हैं। वैसे भी मेरे पिता मोची का धंधा करते हैं , मैं नहीं। यह ढोंग कब तक चलेगा , ठाकुर साहब

सोमवार, 24 जनवरी 2022

Do Jadugar (Bangla Story) : Satyajit Ray

 



 


दो जादूगर (बांग्ला कहानी) : सत्यजित राय

‘पाँच, छह, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह।’ सुरपति ने संदूकों की गिनती पूरी की और अपने सहायक अनिल की ओर मुड़ा। ‘ठीक है।’ उसने कहा, ‘इनको ब्रेक बैन में रखवा दो। सिर्फ पच्चीस मिनट बचे हैं।’


‘मैंने आपका आरक्षण देख लिया है सर’, अनिल ने कहा, ‘यह एक कूपे में है। दोनों बर्थ आपके नाम में आरक्षित हैं। यह सही रहेगा।’ फिर वह थोड़ा हँसा और आगे बोला, ‘गार्ड आपका प्रशंसक है। उसने न्यू एंपायर में आपका शो देखा है। यहाँ सर, इस तरफ आइए!’


गार्ड बीरेन बक्शी एक हाथ आगे बढ़ाए और एक चौड़ी मुसकान लिए आगे आया।


‘मुझे उस मशहूर हाथ से हाथ मिलाने की अनुमति दें।’ उसने कहा, ‘जिस हाथ ने वे सारे करतब दिखाए और मुझे बहुत अधिक खुश होने का अवसर दिया। यह वास्तव में गर्व की बात है।’


सुरपति मंडल की ग्यारह संदूकों में से किसी भी संदूक को देखकर सहज ही समझ में आ जाता कि वह कौन है। प्रत्येक संदूक के दोनों तरफ और उसके ढक्कन पर भी बड़े-बड़े अक्षरों में ‘मंडल के चमत्कार’ लिखा हुआ था। उसे और किसी परिचय की आवश्यकता नहीं थी। उसका पिछला शो करीब दो माह पहले कलकत्ता स्थित ‘न्यू एंपायर’ थिएटर में हुआ था, जहाँ बड़ी संख्या में मौजूद दर्शकों ने उसके मैजिक शो से सम्मोहित होकर बार-बार तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी वास्तविक प्रशंसा की थी। अखबारों में भी उसके शो की बहुत तारीफ छपी थी। जनता की माँग पर, सप्ताह भर के शो की अवधि बढ़ाकर चार सप्ताह करनी पड़ी थी। अंततः, सुरपति को यह वादा करना पड़ा कि वह क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान दुबारा शो करने आएगा।


‘यदि आपको कोई मदद चाहिए तो मुझे जरूर बताएँ।’ गार्ड ने सुरपति को कूपे में दाखिल कराते हुए कहा। सुरपति ने चारों तरफ निगाह डालकर देखा और राहत की साँस ली। वह छोटा डिब्बा उसे पसंद आया।

‘तो फिर ठीक है, सर। क्या मुझे जाने की इजाजत है?’

‘बहुत-बहुत धन्यवाद।’

गार्ड चला गया।


सुरपति खिड़की के पास बैठ गया और फिर उसने सिगरेट की एक डिब्बी निकाली। उसने सोचा, यह तो अभी उसकी सफलता की शुरुआत है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ। अभी उसे अनेक दूसरे राज्यों में जाना था, बहुत स्थानों का दौरा करना था। एक पूरी नई दुनिया उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। वह विदेश यात्रा पर जाएगा और उन्हें दिखा देगा कि कैसे बंगाल से आया एक युवक विश्व में कहीं भी सफल हो सकता है—अमेरिका जैसे देश में भी, जिस देश ने मशहूर हूदिनी को जन्म दिया। अरे हाँ, वह उनको सब दिखाएगा। यह तो शुरुआत ही है।


अनिल हाँफता हुआ आया। ‘सबकुछ ठीक हैं।’ उसने कहा।

‘क्या तुमने ताले देखे?’

‘हाँ, सर।’

‘अच्छा किया।’

‘मैं आपके डिब्बे से तीसरी बोगी में हूँ।’

‘क्या उन्होंने ‘रास्ता साफ’ का सिग्नल दे दिया है?’

‘वे सिग्नल देनेवाले हैं। मैं अब जाऊँगा, सर। क्या आप बर्दवान में एक चाय लेना चाहेंगे?’

‘हाँ, वह अच्छा रहेगा।’

‘तब मैं ले आऊँगा।’


अनिल चला गया। सुरपति ने सिगरेट सुलगाई और यूँ ही खिड़की के बाहर देखने लगा। धक्कम-धक्का करती भीड़, इधर-उधर दौड़ते कुली और फेरी लगाने वालों की चीख-चिल्लाहट की आवाज जल्दी पीछे छूट गई। उसका मन अपने बाल्यकाल में लौट गया। अब वह तैंतीस वर्ष का था। उस विशेष दिन वह आठ वर्ष से अधिक का नहीं रहा होगा। वह जिस गाँव में रहता था, उस गाँव में सड़क किनारे एक बूढ़ी औरत अपने सामने एक बोरा लिये बैठी रहती थी, उसके चारों ओर एक बड़ी भीड़ जुटी हुई थी। उसकी उम्र कितनी रही होगी? साठ? नब्बे वर्ष? कुछ भी हो सकती थी। उसकी उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता। महत्त्वपूर्ण वह था, जो वह अपने हाथों से करती थी। वह कोई भी एक वस्त—एक सिक्का, एक पत्थर का गोला, एक शकोरा, एक सुपारी या एक अमरूद भी हाथ में लेती—और वह वस्तु उन सबकी आँखों के सामने गायब हो जाती। वह बूढ़ी तब तक लगातार पटर-पटर बोलती रहती जब तक कि गायब हुई वस्तु न जाने कहाँ से दुबारा सामने न आ जाती। उसने कालू काका से एक रुपया लिया और वह गायब हो गया। बहुत परेशान कालू काका को गुस्सा आने लगा। बूढ़ी औरत हँसी और हे छूमंतर! वह रुपया सबके सामने मौजूद था। कालू काका की आँखें हैरान रह गईं।


उसके बाद सुरपति किसी चीज पर ज्यादा ध्यान नहीं लगा सका। उस बूढ़ी औरत को उसने फिर कभी नहीं देखा। न ऐसी आश्चर्यजनक करामात उसने कहीं और देखी।


सोलह वर्ष का होने पर वह आगे की पढ़ाई के लिए कलकत्ता चला आया था। कलकत्ता आने पर उसने सबसे पहला काम यह किया कि जादू पर जितनी भी पुस्तकें वह खरीद सकता था, उसने खरीद लीं और उन पुस्तकों में बताई गई युक्तियों का अभ्यास करना शुरू कर दिया। अभ्यास करने के लिए ताश-पत्तों के कई बंडल लेकर किसी दर्पण के सामने घंटों खड़ा रहना पड़ता, और लिखे हुए एक-एक अनुदेश के अनुसार काम करना पड़ता। लेकिन बहुत जल्द, उसने सब कुछ सीख लिया। उसने छोटी-छोटी सभाओं और दोस्तों द्वारा आयोजित पार्टियों में अपने करतबों का प्रदर्शन शुरू कर दिया।


जब वह कॉलेज के द्वितीय वर्ष का छात्र था, उसके एक मित्र गौतम ने सुरपति को अपनी बहन के विवाह में बुलाया। वह शाम, बाद में एक जादूगर की हैसियत से सुरपति के प्रशिक्षण के इतिहास में सबसे अधिक स्मरणीय शाम सिद्ध हुई, क्योंकि उस दिन सुरपति की भेंट पहली बार त्रिपुर बाबू से हुई।


स्विन्हो स्ट्रीट में एक घर के पीछे एक बहुत बड़ा शामियाना लगा हुआ था। त्रिपुरचरन मलिक उस शामियाने के नीचे बैठे हुए थे और विवाह में उपस्थित दूसरे मेहमानों ने उन्हें घेरा हुआ था। एक नजर देखने में वह बहुत साधारण लगते थे। अड़तालीस वर्ष की उम्र, घुँघराले बाल—एक तरफ माँग निकालकर कढ़े हुए, होंठों पर मुसकान, मुँह के दोनों कानों पर चमकते पान के रस की धार। ऐसे लाखों लोग रोजाना देखने को मिलते हैं, त्रिपुरचरन उनसे कतई भिन्न नहीं था। लेकिन उनके सामने बिछे गद्दे पर जो हो रहा था उसे देखकर कोई भी उनके बारे में अपनी राय बदलने में एक क्षण भी नहीं लगाता। सुरपति को पहले तो अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। चाँदी का एक सिक्का लुढ़कता हुआ करीब एक गज की दूरी पर रखी सोने की अँगूठी के पास गया अैर उसकी बगल में जाकर रुक गया, और फिर दोनों लुढ़कते हुए त्रिपुर बाबू के पास लौट आए। सुरपति आश्चर्य से निकल कर सँभल पाता, उससे पहले ही गौत के अंकल के हाथ से माचिस की डिब्बी छूट कर जमीन पर गिर गई। सारी तीलियाँ बाहर बिखर गईं।


‘उन्हें उठाने की परेशानी मत उठाओ।’ त्रिपुर बाबू ने कहा। ‘तुम्हारी ओर से मैं उन्हें इकट्ठा कर दूँगा।’ उन्होंने सिर्फ एक बार अपना हाथ फिराया और सारी तीलियों का ढेर गद्दे पर रख दिया। फिर माचिस की खाली डिब्बी अपने बाएँ हाथ में लेकर उन्होंने पुकारना शुरू किया, ‘मेरे पास आओ, प्रिय। आओ, आओ, आओ।’ एक-एक तीली हवा में उठती और वापस डिब्बी के अंदर चली जाती, मानो वे तीलियाँ न होकर उनके पालतू जानवर हों और अपने मालिक की आज्ञा का पालन कर रहे हों।


डिनर के पश्चात् सुरपति सीधा उनके पास चला गया। त्रिपुर बाबू को उसकी रुचि देखकर बड़ी हैरानी हुई। ‘मैंने कभी किसी को जादू सीखने में रुचि दिखाते नहीं देखा है। अधिकतर लोग तमाशा देखने में खुश रहते हैं।’ उन्होंने कहा।


दो-चार दिन के बाद सुरपति उनके घर गया। वास्तव में उसे घर कहना अतिशयोक्ति होगी। त्रिपुर बाबू एक पुराने और जीर्ण-शीर्ण बोर्डिंग हाउस में एक छोटे से कमरे में रहते थे। घर के हर कोने से गरीबी झाँक रही थी। त्रिपुर बाबू ने उसे बताया कि अपना जादू दिखा-दिखाकर वह किस तरह अपनी गुजर-बसर किया करते हैं। प्रत्येक शो के लिए वह पचास रुपए लेते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें बहुत अधिक निमंत्रण नहीं मिलते हैं। इसका मुख्य कारण सुरपति की जानकारी के अनुसार, त्रिपुर बाबू के अपने उत्साह का अभाव था। सुरपति कल्पना नहीं कर सका कि इतना प्रतिभाशाली कोई व्यक्ति अपनी महत्त्वाकांक्षी के प्रति पूर्णतया उदासीन कैसे हो सकता है। इस बात का जिक्र करने पर त्रिपुर बाबू ने एक आह के साथ कहा, ‘अधिक शो करने की कोशिश का क्या लाभ होगा? कितने लोग हैं, जो एक सच्चे कलाकार की प्रतिभा की कद्र करते हैं? तुमने देखा नहीं, उस विवाह में डिनर की घोषणा होते ही कैसे सब लोग दौड़ गए? सिर्फ एक तुमको छोड़कर, क्या कोई भी लौटकर मेरे पास आया?’


इसके बाद सुरपति ने अपने दोस्तों से बात की और कुछ शो कराने का इंतजाम कर दिया। त्रिपुर बाबू संभवतः कुछ तो कृतज्ञता के कारण और कुछ उस लड़के के प्रति वास्तविक स्नेह के कारण उसे अपनी कला सिखाने के लिए राजी हो गए।


‘मुझे कोई फीस नहीं चाहिए।’ उन्होंने दृढता से कहा, ‘मुझे खुशी है कि मेरे चले जाने के बाद कोई तो मेरी विरासत को आगे बढ़ाएगा। लेकिन याद रहे, तुम्हें धैर्य रखना होगा। जल्दबाजी में कुछ नहीं सीखा जा सकता है। अगर तुम अच्छी तरह कुछ सीख जाते हो तो तुम जान जाओगे कि सृजन में कितना आनंद प्राप्त होता है। बहुत अधिक सफलता या प्रसिद्धि तत्काल पाने की अपेक्षा मत रखना। लेकिन मैं कह सकता हूँ कि तुम जीवन में मेरे मुकाबले कहीं अधिक नाम कमाओगे, क्योंकि तुम्हारे अंदर महत्त्वाकांक्षा है, जो मेरे पास नहीं है।’

कुछ-कुछ घबराए हुए सुरपति ने पूछा, ‘क्या आप मुझे वह सब सिखा देंगे जो आप जानते हैं? वह सिक्के और अँगूठीवाला खेल भी?’


त्रिपुर बाबू हँस पड़े। ‘तुमको धीरे-धीरे एक-एक कदम चलकर सीखना होगा। इस कला को सीखने के लिए धैर्य और अध्यवसाय की बहुत आवश्यकता होती है। इस कला का विकास प्राचीन समय में हुआ, जब इनसान की इच्छा शक्ति और एकाग्रता बहुत तीव्र हुआ करती थी। आधुनिक इनसान के लिए वहाँ जाना आसान नहीं है। तुमको नहीं पता, मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा था।’


सुरपति ने त्रिपुर बाबू के पास नियमित रूप से जाना शुरू कर दिया। लेकिन करीब छह माह बाद ही कुछ ऐसी घटना हुई, जिसके कारण उसका जीवन पूरी तरह बदल गया।


एक दिन कॉलेज के रास्ते में सुरपति ने चौरंधी की दीवारों पर बहुत सारे रंगीन पोस्टर लगे हुए देखे। ‘शेफालो द ग्रेट’ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था। थोड़ा करीब से देखने पर पता चला कि शेफालो एक इतालवी जादूगर है। वह कलकत्ता आ रहा था अपनी सहायक मैडम पलर्मो के साथ।


उन्होंने ‘न्यू एंपायर’ में अपना जादू का खेल दिखाया। सुरपति एक रुपए वाली सीट पर बैठा और प्रत्येक खेल को पूरी तरह डूबकर देखता रहा। इन करामातों के बारे में उसने सिर्फ किताबों में पढ़ा था। उसकी आँखों के सामने लोग देखते-ही-देखते धुएँ के बादल में गायब हो गए और फिर उसी सर्पिल धुएँ से दुबारा प्रकट हो गए, अल्लादीन के जिन की तरह। एक लड़की को लकड़ी के बक्से में बंद कर दिया गया। शेफालो ने उस बक्से को आरी से दो हिस्सों में काट दिया, लेकिन वह लड़की एक दूसरे बक्से से हँसती हुई बाहर निकल आई, पूरी तरह सुरक्षित। उस रात सुरपति की हथेलियों में बहुत दर्द हुआ। उसने इस कदर तालियाँ जो बजाई थीं।


उसने शेफालो को बहुत ध्यान से देखा। वह जितना अच्छा जादूगर था उतना ही अच्छा एक अभिनेता भी था। उसने एक चमकीला काला सूट पहना हुआ था। उसके हाथ में एक जादुई छड़ी थी और उसके सिर पर एक हैट था। उस हैट से तरह-तरह की वस्तुएँ बाहर आने का सिलसिला रुकता ही नहीं था। एक बार उसने हैट में अपना हाथ डाला और एक खरगोश को कानों से पकड़कर बाहर खींच लिया। इससे पहले कि खरगोश अपने कानों को सहलाता, एक के बाद एक कबूतर बाहर आने लगे—एक, दो, तीन, चार। वे स्टेज के चारों ओर फड़फड़ाने लगे। इस बीच शेफालो ने अपने हैट से ढेर सारी चॉकलेट निकालकर दर्शकों की तरफ फैलाना शुरू कर दिया।


सुरपति ने एक और चीज देखी। शेफालो अपना खेल दिखाते समय बराबर बोलता रहा, एक क्षण के लिए भी रुका नहीं। बाद में सुरपति को पता चला कि इसे जादूगर की बड़बड़ाहट कहते हैं। दर्शक उसके निरंतर शब्द प्रवाह से बँधे रहते हैं, और जादूगर चुपचाप अपनी कलाकारी का प्रदर्शन करता रहता है, हाथ की सफाई, थोड़ा छल-कपट।


लेकिन मैडम पलर्मो अलग थी। वह एक शब्द भी नहीं बोली। फिर, कैसे वह हर एक को ठग सकी? सुरपति को इसका जवाब बाद में मिला। स्टेज पर कुछ करतब ऐसे भी दिखाए जा सकते हैं, जहाँ जादूगर के हाथों को कुछ भी करने की खास जरूरत नहीं होती है। सब-कुछ यंत्र चालित उपकरण के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है, जिसे चलाने वाले परदे के पीछे रहते हैं। किसी आदमी को धुएँ में गायब होते दिखाना या किसी लड़की को दो हिस्सों में काटना, दोनों इसी प्रकार की चालाकियाँ हैं, जो पूरी तरह उपकरण के प्रयोग पर निर्भर करती हैं। बहुत पैसे वाला कोई भी व्यक्ति उस उपकरण को खरीद सकता है अैर स्टेज पर खेल दिखा सकता है, लेकिन निस्संदेह प्रस्तुत करने की कला आना भी बहुत जरूरी है। कला की पूर्ण प्रस्तुति में व्यक्ति की सहज प्रवृत्ति एवं उचित आंतरिक प्रेरणा, मोहित करने की कला का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। यह कर सकना हर किसी के वश की बात नहीं है। हर कोई नहीं...


सुरपति चौंक कर अपने दिवास्वप्न से बाहर आ गया। गाड़ी ने झटके दे-देकर अभी स्टेशन से निकलना शुरू ही किया था कि एक आदमी ने बाहर से उसके डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर चढ़ आया। सुरपति ने जैसे ही यह कहकर विरोध करना चाहा कि ये सीटें आरक्षित हैं, उसी व्यक्ति के चेहरे पर नजर पड़ते ही वह हैरान रह गया। शुक्रिया ईश्वर का—यह तो त्रिपुर बाबू निकले।


त्रिपुरचरन मलिक!


विगत में भी कई दृष्टांत हो चुके हैं, जब सुरपति को इसी का अनुभव हुआ। किसी व्यक्ति के बारे में सोचते ही उसके साक्षात् हो जाने की घटना सुरपति के साथ पहले ही घट चुकी थी। लेकिन त्रिपुर बाबू को इस प्रकार अपने डिब्बे में पाने जैसी घटना के आगे पिछली सभी घटनाएँ फीकी पड़ गईं।


सुरपति अवाक् बना रहा। त्रिपुर बाबू ने अपनी धोती के छोर से अपना माथा पोंछा, साथ में लाई पोटली को उन्होंने सामनेवाली सीट पर रखा और बैठ गए। फिर उन्होंने सुरपति को देखा और हँसे, ‘आश्चर्य, क्या तुम...नहीं हो?’

सुरपति ने मुश्किल से कंठ निगला। ‘मैं...हाँ, मैं चकित हूँ। असल में, मुझे पक्का पता नहीं था कि आप अभी तक जीवित हैं।’

‘वास्तव में?’


‘हाँ। कॉलेज समाप्त होने के बाद ही मैं आपके बोर्डिंग हाउस गया था। आपके कमरे पर ताला लगा हुआ था। मैनेजर ने मुझे बताया कि आप एक कार के नीचे आ गए थे...।’


त्रिपुर बाबू हँसे। ‘वह बल्कि ज्यादा अच्छा होता। मैं कम-से-कम अपनी सारी चिंताओं एवं परेशानियों से तो मुक्त हो जाता।’

‘इसके अलावा,’ सुरपति ने कहा, ‘कुछ देर पहले तक मैं आपके विषय में ही सोच रहा था।’


‘अरे हाँ!’ त्रिपुर बाबू के चेहरे के ऊपर से एक छाया गुजर गई। ‘क्या तुम वास्तव में मेरे बारे में सोच रहे थे? तुम्हारा मतलब है, तुम अभी भी मुझे याद करते हो? आश्चर्य की बात है।’

सुरपति ने लज्जा से अपना होंठ काट लिया।


‘ऐसा मत कहिए, त्रिपुर बाबू! मैं आपको कैसे भूल सकता हूँ? क्या आप मेरे पहले गुरु नहीं थे? मैं उन दिनों को याद कर रहा था, जब हम साथ थे। मैं पहली बार बंगाल के बाहर अपना खेल दिखाने जा रहा हूँ, अब मैं एक पेशेवर जादूगर हूँ—क्या आपको पता था?’


त्रिपुर बाबू ने सहमति में सिर हिलाया। ‘हाँ, मुझे तुम्हारे बारे में सब मालूम है। इसीलिए मैं आज तुमसे मिलने आया हूँ। देखो, मैं पिछले बारह वर्ष से तुम्हारे कैरियर को करीब से देखता आ रहा हूँ। जब ‘न्यू एंपायर’ में तुम्हारा शो था, मैं पहले दिन ही वहाँ गया था और अंतिम पंक्ति में बैठा था। मैंने सबको तालियाँ बजाते देखा। हाँ, मुझे तुम पर गर्व महसूस हुआ। लेकिन...’


बोलते-बोलते वह रुक गए। सुरपति समझ नहीं पाया कि क्या कहा जाए। वैसे भी कहने के लिए कुछ खास था नहीं था। अगर महसूस कर रहे थे कि उन्हें ठेस लगी है और उपेक्षित छोड़ दिया गया है तो इसमें त्रिपुर बाबू का कोई दोष नहीं। बहरहाल, अगर उन्होंने शुरू में ही सुरपति की मदद नहीं की होती तो सुरपति उस जगह कभी न पहुँच पाता, जहाँ वह आज है। लेकिन उसने बदले में त्रिपुर बाबू के वास्ते क्या किया? कुछ भी नहीं। उलटे यह जरूर हुआ कि त्रिपुर बाबू और उनके आरंभिक दिनों की याद उसके मन में बहुत धुँधली पड़ गई थी। इसी प्रकार, कृतज्ञता की भावना भी मिट चली थी।


त्रिपुर बाबू फिर बोलने लगे, ‘हाँ, मैंने उस दिन तुम्हारे बारे में गर्व का अनुभव किया, यह देखकर कि तुमने कितनी सफलता हासिल कर ली है। लेकिन मुझे थोड़ा खेद भी हुआ। जानते हो ‘क्यों? इसलिए’ क्योंकि तुमने जो रास्ता चुना है, वह एक सच्चे जादूगर के लिए सही रास्ता नहीं है। उन जुगतों के प्रयोग से तुम दर्शकों का मनोरंजन कर सकते हो और उन्हें बहुत हद तक प्रभावित करने में भी सफल हो सकते हो; लेकिन कोई भी सफलता तुम्हारी अपनी नहीं होगी। क्या तुम्हें याद है, मैं किस प्रकार का जादू दिखाया करता था?’


सुरपति भूला नहीं था। उसे यह भी याद था कि त्रिपुर बाबू उस समय बहुत हिचकिचाहट में थे, जब उन्हें अपनी सबसे बढि़या बाजीगरी या हाथ की सफाई उसे सीखनी थी। ‘तुम्हें अभी थोड़ा और समय चाहिए,’ वह कहते। लेकिन सही समय कभी नहीं आया। उसके कुछ समय बाद ही शेफालो का आगमन हुआ और दो माह बाद त्रिपुर बाबू स्वयं लुप्त हो गए।


सुरपति को आश्चर्य के साथ-साथ बहुत निराशा भी हुई, जब त्रिपुर बाबू वहाँ नहीं मिले, जहाँ वह रहते थे। लेकिन ये भावनाएँ अधिक समय तक नहीं रहीं। उसके मन में शेफालो भरा हुआ था और अपने भविष्य के सपने थे—कि वह हर जगह की यात्रा करेगा, हर जगह अपना खेल दिखाएगा। उसके नाम से लोग उसे पहचानेंगे और वह जहाँ भी जाएगा, तालियों से उसका स्वागत होगा और प्रशंसा प्राप्त होगी।


त्रिपुर बाबू विचारमग्न थे और खिड़की के बाहर ताक रहे थे। सुरपति ने उन्हें थोड़ा और निकट से देखा। देखकर लगता था कि उन्हें कठिन समय से गुजरना पड़ा है। उनके सारे बाल सफेद हो गए थे उनकी खाल धँस गई थी और उनकी आँखें गड्ढों में चली गई थीं। लेकिन, क्या उनकी आँखों की दृष्टि जरा भी मंद हुई थी? नहीं। उनकी दृष्टि आश्चर्यजनक रूप से आज भी उतनी ही पैनी थी।

उन्होंने आह भरी।


‘सचमुच, मैं जानता हूँ, तुमने यह रास्ता क्यों चुना? मैं जानता हूँ, तुम मानते हो—और इसके लिए शायद मैं भी अंशतः उत्तरदायी हूँ कि सादगी को प्रायः यथायोग्य सम्मान नहीं मिलता है। स्टेज पर खेल-तमाशा दिखाने के लिए तड़क-भड़क और कुछ छल की आवश्यकता होती है। होती है न?’


सुरपति असहमत नहीं हुआ। शेफालो के हुनर का वह कायल हो गया था। सच में, थोड़ी-बहुत चकाचौंध से कोई नुकसान नहीं होता। आज स्थितियाँ बदल गई हैं। शादी-विवाह में साधारण खेल-तमाशा दिखाकर कोई कितना हासिल कर सकता है? बिना किसी काट-छाँटवाली विशुद्ध जादूगरी के प्रति सुरपति के मन में अगाध सम्मान था। लेकिन उस प्रकार के जादू का कोई भविष्य नहीं था। सुरपति यह समझता था और इसी कारण उसने एक अलग रास्ते पर चलने का फैसला किया था।


उसने त्रिपुर बाबू को यह सब कह डाला और त्रिपुर बाबू अचानक उत्तेजित हो गए। बेंच पर पालथी मारकर बैठे-बैठे वह उसी आक्रोश में थोड़ा आगे की ओर झुक आए—‘सुनो, सुरपति!’ उन्होने कहा, ‘अगर तुम्हें पता होता कि असल जादू क्या होता है तो तुम नकली जादू के पीछे नहीं भागते। जादू सिर्फ हाथ की सफाई नहीं है, हालाँकि उसे सीखने लिए भी सालों अभ्यास करना पड़ता है। उसके आगे भी बहुत कुछ है। सम्मोहन! जरा सोचो इसके बारे में। तुम एक व्यक्ति को पूरी तरह वश में कर सकते हो—सिर्फ उस पर अपनी दृष्टि गड़ाकर। फिर अतींद्रिय दृष्टि है, दूरानुभूति (टेलीपैथी) है और पर-विचार ज्ञान है। अगर तुम चाहो तो किसी दूसरे के विचारों में प्रवेश कर सकते हो। व्यक्ति की नाड़ी स्पर्श करके ही तुम बता सकते हो कि वह क्या सोच रहा है। अगर तुम इस कला को पूरी तरह आत्मसात् कर लो तो तुम्हें व्यक्ति को छूने की भी जरूरत नहीं होगी। तुम्हें केवल एक मिनट उस व्यक्ति को घूरकर देखना होगा और तुम उसके विचारों को जान सकोगे। यह सबसे बड़ा जादू है। उपकरण और जुगत की इसमें कोई जगह नहीं है। इसमें सिर्फ समर्पण, अध्यवसाय और गहन एकाग्रता चाहिए।’


त्रिपुर बाबू साँस भरने के लिए रुके। फिर वह सुरपति के और निकट खिसक आए और कहने लगे, ‘मैं तुमको यह सब सीखाना चाहता था। तुम प्रतीक्षा नहीं कर सके। विदेश से आए एक छली ने तुम्हारा दिमाग पलट दिया। तुमने सही रास्ता त्याग दिया और भटक गए आडंबर की दुनिया में जल्दी पैसा कमाने के उद्देश्य से।’

सुरपति खामोश रहा। वह किसी भी बात से इनकार नहीं कर सका।


त्रिपुर बाबू कुछ नरम पड़ गए। उन्होंने सुरपति के कंधे पर हाथ रखा और नरमी के साथ आगे बोलने लगे, ‘आज मैं सिर्फ एक अनुरोध करने आया हूँ। अब तक तुम्हें अंदाजा हो गया होगा कि मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। मुझे अनेक करतब आते हैं, लेकिन पैसा कमाने की चालबाजी मैंने अभी तक नहीं सीखी है। मैं जानता हूँ, मुझमें महत्त्वाकांक्षा की कमी है, वही एकमात्र कारण है। आज मैं घोर निराशा में डूबा हुआ हूँ, सुरपति। मुझमें अब इतनी सामर्थ्य एवं शक्ति नहीं है कि अपने जीवन-निर्वाह के लिए फिर से कोशिश कर सकूँ। मुझे बस, इतना भरोसा है कि तुम मेरी मदद करोगे, भले ही इसके लिए तुम्हें कोई त्याग क्यों न करना पड़े। मेरे वास्ते यह कर दो सुरपति, और मैं वादा करता हूँ कि फिर कभी मैं तुमको परेशान नहीं करूँगा।’

सुरपति उलझन में पड़ गया। वह किस प्रकार की मदद चाहते हैं?


त्रिपुर बाबू आगे बोले, ‘मैं अब आगे जो कहने जा रहा हूँ, तुमको धृष्टता लग सकती है। लेकिन कोई दूसरा उपाय नहीं है। देखो, यह मेरे लिए सिर्फ धन चाहने की बात नहीं है। इस वृद्धावस्था में मेरी एक विलक्षण इच्छा है। मैं स्टेज पर, दर्शकों की एक बड़ी भीड़ के सामने अपना खेल दिखाना चाहता हूँ। मैं उनको अपनी सबसे श्रेष्ठ बाजीगरी, जो मैं जानता हूँ, दिखाना चाहता हूँ। यह पहला और अंतिम अवसर हो सकता है, लेकिन मैं इस चाह को अपने मन से निकाल नहीं सकता।’


एक ठंडे हाथ ने सुरपति के दिल को जकड़ लिया। त्रिपुर बाबू अंततः मुद्दे पर आ गए—‘तुम लखनऊ में शो करने जा रहे हो। जा रहे हो न? मान लो कि तुम अंतिम क्षण में बीमार हो जाते हो? निस्संदेह, तुम अपने दर्शकों को निराश नहीं करना चाहोगे। मान लो, कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हारा स्थान ले लेता है...’


सुरपति पूरी तरह हक्का-बक्का रह गया। वह कहना क्या चाहते हैं। वह असल में बहुत निराश होंगे, अन्यथा ऐसा अजीब प्रस्ताव लेकर वह कभी नहीं आते।


सुरपति पर अपनी दृष्टि गड़ाए हुए त्रिपुर बाबू ने कहा, ‘तुम्हें सिर्फ यह कहना होगा कि किसी अपरिहार्य कारण से तुम अपना खेल नहीं दिखा सकते; लेकिन यह कि तुम्हारी जगह तुम्हारे गुरु आ रहे हैं अपना करतब दिखाने। क्या लोगों को इस बात से अफसोस होगा और उनका दिल टूट जाएगा? मैं ऐसा नहीं मानता। मैं सोचता हूँ, उन्हें मेरा प्रदर्शन पसंद आएगा। इसके बावजूद तुम पहली शाम की कमाई में से आधा अपने पास रख सकते हो। बाकी रकम से मेरा काम चल जाएगा। उसके पश्चात् तुम अपने रास्ते जा सकते हो। मैं तुमको दुबारा कभी तंग नहीं करूँगा। लेकिन यह एक मौका तो तुमको मुझे देना ही होगा, सुरपति—केवल एक बार।’


‘असंभव!’ सुरपति को गुस्सा आ गया’ ‘आप जो कह रहे हैं वह एकदम नामुमकिन है। आपको पता नहीं, आप क्या कह रहे हैं। मैं बंगाल के बाहर पहली बार अपनी बाजीगरी का प्रदर्शन करने जा रहा हूँ। क्या आप समझ नहीं सकते कि लखनऊ में मेरा यह शो मेरे लिए क्या अर्थ रखता है? क्या आप वास्तव में चाहते हैं कि मैं अपने नए पेशे की शुरुआत एक झूठ से करूँ? आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं?’


त्रिपुर बाबू ने उस पर एक ठंडी व सपाट दृष्टि डाली। फिर उनकी आवाज सारे शोर व गुल से ऊपर उठ गई। लगता था जैसे डिब्बे को चीर डालेगी—‘क्या तुम अभी भी सिक्के और अँगूठी के उस पुराने दाँव में रुचि रखते हो?’

सुरपति चौंक गया। लेकिन त्रिपुर बाबू की आँखों का भाव नहीं बदला।

‘क्यों?’ सुरपति ने पूछा।

त्रिपुर बाबू बुजदिली से हँसे, ‘अगर तुम मेरा सुझाव मानोगे तो मैं तुम्हें वो हुनर सिखा दूँगा। अगर तुम नहीं...’


उस क्षण उनकी आवाज हावड़ा जा रही ट्रेन की सीटी की तेज आवाज में डूब गई। गुजरती हुई ट्रेन की तेज रोशनी ने उनकी आँखों में विचित्र चमक को पकड़ लिया।

‘और अगर मैं न मानूँ?’ सुरपति ने नम्रता से पूछा, जब शोर जा चुका था।


‘तुम पछताओगे। यह कुछ ऐसी बात है, जो तुम्हें पता होनी चाहिए। अगर मैं दर्शकों के बीच बैठा होऊँ तो मैं अपनी शक्ति से एक जादूगर किसी भी जादूगर को बड़ी परेशानी में डाल सकता हूँ। यहाँ तक कि मैं उसे पूरी तरह असहाय बना सकता हूँ।’


त्रिपुर बाबू ने अपनी जेब से ताश के पत्तों का एक बंडल निकाला। ‘देखते हैं, तुम कितने होशियार हो। क्या तुम इस गुलाम को पीछे से ले सकते हो और आगे लाकर इसे चिड़ी की इस तिक्की के ऊपर रख सकते हो, अपने हाथ की सिर्फ एक हरकत से?’


सुरपति ने पहले-पहले जो करामात सीखी थीं, उनमें से एक यह करामात भी थी। सोलह वर्ष की आयु में उसने यह हुनर केवल सात दिनों में पूरी तरह सीख लिया था।

और आज?


सुरपति ने ताश का पैकेट लिया और उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उँगलियाँ सुन्न होने लगी हैं। फिर उसकी कलाई, उसकी कुहनी सुन्न पड़ गई और अंततः पूरी बाँह को जैसे लकवा मार गया। सुरपति ने हैरानी में त्रिपुर बाबू की ओर देखा। उन्होंने एक विचित्र-सी मुसकान के साथ मुँह टेढ़ा किया हुआ था और उनकी आँखें सीधे सुरपति की आँखों में घूर रही थीं। उनकी आँखों में अमानवीय दृष्टि थी। सुरपति के माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें निकल आईं। उसका सारा बदन काँपने लगा।

‘क्या अब मेरी शक्ति में तुम विश्वास करते हो?’


ताश के पत्तों की ढेरी सुरपति के हाथों से छूट गई। त्रिपुर बाबू ने उसे बड़ी सफाई से उठा लिया और कहा, ‘क्या अब तुम मेरे सुझाव को मानने के लिए तैयार हो?’

सुरपति को अब कुछ बेहतर लगने लगा। ‘क्या आप वास्तव में मुझे वह पुरानी करामात सिखाएँगे?’ सुरपति ने थकावट महसूस करते हुए पूछा।


त्रिपुर बाबू ने एक उँगली उठाई, ‘तुम्हारा गुरु त्रिपुरचरन मलिक लखनऊ में तुम्हारी जगह खेल का प्रदर्शन करेगा; क्योंकि तुम अचानक बीमार हो जाते हो। क्या यह ठीक है?’

‘हाँ।’

‘उस शाम की आधी कमाई तुम मुझे दोगे। ठीक?’

‘ठीक।’

‘तो फिर, ठीक...’


सुरपति ने अपनी जेब से पचास पैसे का एक सिक्का निकाला और अपनी मूँगे की अँगूठी उतारी। एक शब्द भी बोले बिना उसने दोनों चीजें त्रिपुर बाबू को सौंप दीं।


जब ट्रेन बर्दवान स्टेशन पर रुकी, अनिल चाय का प्याला लिये आ गया और उसने अपने बॉस को गहरी निद्रा में पाया।

‘सर!’ अनिल ने कुछ पल के संकोच के बाद कहा।

सुरपति तुरंत जाग गया।

‘कौन...क्या है यह?’

‘आपकी चाय सर। सॉरी, मैंने आपको परेशान किया।’

‘लेकिन...?’ सुरपति ने बेताबी से चारों तरफ नजर घुमाई।

‘बात क्या है?’

‘त्रिपुर बाबू... वह कहाँ हैं?’

‘त्रिपुर बाबू!’ अनिल उलझन में पड़ गया।

‘अरे नहीं, नहीं। वह तो गाड़ी के नीचे आ गए थे, क्या उन्हें गाड़ी मार कर नहीं चली गई? बहुत पहले—१९५१ में। लेकिन मेरी अँगूठी कहाँ है?’

‘कौन सी अँगूठी, सर? मूँगेवाली अँगूठी तो आपकी उँगली पर है।’

‘हाँ, हाँ, सचमुच। और...’

सुरपति ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक सिक्का निकाला। अनिल ने गौर किया कि उसके मालिक के हाथ काँप रहे हैं।

‘अनिल’, सुरपति ने पुकारा, ‘जल्दी आओ। खिड़कियाँ बंद कर दो, ओके। अब यह देखो।’


सुरपति ने अँगूठी को बेंच के एक सिरे पर रखा और सिक्के को दूसरे सिरे पर। ‘ईश्वर मेरी मदद करो!’ उसने मौन प्रार्थना की और एक गहरी सम्मोहक दृष्टि पूर्णतया सिक्के पर टिकाए रखी, ठीक उसी तरह जैसा कुछ क्षण पहले उसे सिखाया गया था। सिक्का अँगूठी की तरफ लुढ़कने लगा और फिर दोनों—सिक्का एवं अँगूठी दो आज्ञाकारी बच्चों की तरह लुढ़कते हुए सुरपति के पास लौट आए।


अनिल के हाथ से प्याला छूटकर फर्श पर गिर गया होता, अगर सुरपति ने अंतिम क्षण में चमत्कारिक रूप से अपना हाथ बढ़ाकर उसे बीच में ही न लपक लिया होता।

सुरपति ने लखनऊ में अपना शो अपने स्वर्गीय गुरु त्रिपुरचरन मलिक को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आरंभ किया।


उस शाम सुरपति ने जो अंतिम खेल प्रस्तुत किया, उसका परिचय असली भारतीय जादू के रूप में दिया गया। वही, सिक्का और अँगूठी का खेल।

Professor Shanku Aur Lal Machhli Ka Rahasya : Satyajit Ray (Bangla Story)

 


 


प्रोफेसर शंकू और लाल मछली का रहस्य : सत्यजित राय (बांग्ला कहानी)

13 जनवरी

पिछले कई दिनों जिक्र करने लायक कोई घटना नहीं घटी, इसीलिए डायरी नहीं लिखी। आज एक स्मरणीय दिन है, इसलिए कि आज मेरा 'लिंगुआग्राफ' बन गया। इस यन्त्र से किसी भी भाषा की बात रेकर्ड होकर महज तीन मिनट में उसका बंगला अनुवाद छपकर निकल आता है। मुझे यह जानने की बड़ी ललक थी, जानवरों की भाषा का कोई मतलब होता है या नहीं। आज अपने बिल्ले न्यूटन की कुल तीन ‘म्याऊँ' को रेकर्ड करके उसके तीन मतलब निकाले। एक में बोला 'दूध चाहिए', एक में 'मछली चाहिए', एक में 'चूहा चाहिए'। तो क्या बिल्लियाँ भूख लगे बिना बोलती नहीं? और दो तरह की ‘म्याऊँ' रेकर्ड किए बिना यह जानने का उपाय नहीं।


मछली की चर्चा आते ही आज एक बंगला अखबार में जो एक खबर छपी है, यह सच है कि झूठ, नहीं जानता, उसकी याद आ गई। वह खबर यदि मनगढंत भी हो, तो गढ़नेवाले की कल्पना-शक्ति की तारीफ करनी चाहिए। वह खबर यहाँ दिए दे रहा हूँ-


"गोपालपुर, 10 जनवरी । स्थानीय संवाददाता के एक विवरण से गोपालपुर के समुद्रतट की एक आश्चर्यजनक घटना प्रकाश में आई है। उस विवरण में यह कहा गया है कि कलनूलिया वर्ग के कुछ मछुआरे जाल डालकर जब उसे खींचकर ऊपर लाए, तो जाल में से लाल रंग की बीस-पचीस मछलियाँ कूदती हुई फिर से समुद्र के पानी में गायब हो गईं। नूलिया लोगों में से कोई भी यह नहीं बता सका कि यह किस तरह की मछली है। और जाल में से निकलकर मछली का यों भाग जाना भी उनके अनुभव में सर्वथा नया था।"


मेरे पड़ोसी अविनाश बाबू ने इस समाचार को पढ़कर कहा, “बस, यह तो इब्तदा है! अब देखिएगा, मछली ही बंसी डालकर जमीन से आदमी को फँसा-फँसाकर फ्राइ करके खा रही हैं! जलचर, थलचर और नभचर–इन्हीं तीन वर्गों के जीवों पर आदमी आज तक जुल्म ढाता चला आ रहा है। किसी न किसी दिन उसका फल भोगना पड़ेगा, इसमें ताज्जुब की कौन-सी बात है? मैं तो साहब अरसे से वैष्णवी भोजन की सोच रहा हूँ ।"


अविनाश बाबू की आखिरी बात झूठ थी और कुछ न सही, कम-से-कम हिलसा मछली की गन्ध मिल जाने पर अविनाश बाबू और मेरे 'न्यूटन' में कोई फर्क नहीं रह जाता, यह मैंने अपनी आँखों देखा है बहुत बार। मगर अविनाश बाबू कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बोलते ही हैं, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा। आज सर्दी ज़रा ज्यादा ही पड़ी है। यह भी एक घटना है। अपनी प्रयोगशाला के थर्मामीटर में सबेरे देखा, 42 डिग्री फारेनहाइट। गिरिडिह में जमाने से ऐसी सर्दी नहीं पड़ी। मेरी ‘एयर कंडिशनिंग गोली' अच्छा काम कर रही है। कमीज की ऊपरवाली जेब में एक गोली रख लेता हूँ, गरम कपड़े की कोई जरूरत नहीं पड़ती।


16 जनवरी

आज के 'स्टेट्समैन' के पहले पृष्ठ पर जो एक खबर छपी है, उसका हिन्दी तर्जुमा यहाँ दे रहा हूँ-

"वालटेयर, 14 जनवरी। एक स्थानीय समाचार से यह जाना गया कि कल सबेरे नाइजीरिया का एक युवक नहाते हुए एक मछली के काटने से जान से हाथ धो बैठा। लार्स कर्नस्टाट नाम का अट्ठाइस साल का यह जवान अपने एक मित्र, मद्रासी परमेश्वर के साथ नहाने के लिए पानी में उतरा था। अचानक भारतीय युवक ने अपने मित्र की चीख सुनकर मुड़कर उसकी ओर ताका। देखा, बित्ताभर की एक लाल मछली कर्नस्टाट के गले में दाँत गड़ाए लटकी हुई है। परमेश्वर जब तक लपककर अपने मित्र के पास पहुँचा, वह मछली पानी में गायब हो चुकी थी। कर्नस्टाट तुरत बेहोश हो गया। उसे खींचकर सूखी रेती तक लाते-लाते उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके थे। पुलिस घटना की छानबीन कर रही है। बहरहाल वालटेयर के समुद्र में नहाने की मनाही कर दी गई है।"


पहले गोपालपुर फिर वालटेयर। दोनों मछलियाँ एक ही जाति की लगती हैं। या तो दोनों ही खबरों को गप्प कहकर उड़ा दिया जा सकता है या फिर दोनों पर विश्वास करना चाहिए।


आज तमाम दिन मछलियों के बारे में पढ़ा। जितना ही पढ़ा, इन दोनों घटनाओं की अस्वाभाविकता उतनी ही समझ में आई। सबेरे इस खबर को पढ़कर बैठक में बैठा सोचने लगा, इसी मौके से एक बार गोपालपुर घूम आता तो बेजा नहीं था। ऐन वक्त पर अविनाश बाबू कूदते-हाँफते हुए आ धमके और अपने हाथ के अखबार को मेरी नाक के सामने हिलाते हुए बोले, “पढ़ लिया जनाब, पढ़ा? क्या कहा था मैंने? आदमी के खिलाफ अभियान आल रेडी शुरू हो गया!"


मैंने कहा, "तो मैं यह कहूँगा कि अभियान मेरे खिलाफ नहीं, आपके खिलाफ है। क्योंकि मैं नाममात्र को भी मांस-मछली नहीं खाता और आपको दोनों जून पाँच टुकड़ी मछली हुए बिना नहीं चलता।"

अविनाश बाबू धप्प से सोफे पर बैठ गए। अखबार को बगल में फेंककर बोले, “क्या खूब कहा आपने! मछली के बगैर लोग जीते कैसे हैं, नहीं जानता।"

मैंने इस पर कुछ नहीं कहा। बस पूछा, “समुद्र देखा है?" ।


अविनाश बाबू ने अपने गुलूबन्द को और अच्छी तरह से गले में लपेटते हुए कहा, “दुर्, समुद्र क्या, हाथी! जाऊँ-जाऊँ करते-करते पुरी तक तो जाना नसीब नहीं हुआ। बात दरअसल क्या है, बताऊँ। समुन्दर की मछली मुझे रुचती नहीं। और मैंने सुना है, वहाँ वही सब खाना पड़ता है।"


मेरे गोपालपुर जाने का इरादा सुनकर भले आदमी ज़रा चुप रहकर बोले, "आपके साथ लटक जाऊँ क्या? साठ से ज्यादा उम्र हो गई, आज तक समुद्र नहीं देखा, मरुभूमि नहीं देखी, खांडली पहाड़ के सिवाय पहाड़ नहीं देखा-आखिर मरते वक्त अफसोस करके मरना होगा क्या?"


मैंने गोपालपुर जाना एक प्रकार से तय कर लिया। इस अनोखी मछली का पता न भी चले, तो एकान्त में मेरे लिखने-पढ़ने का काम बहुत कुछ आगे बढ़ जाएगा और जलवायु परिवर्तन भी हो जाएगा।


21 जनवरी

दो दिन हुए, गोपालपुर आया हूँ। आखिर अविनाश बाबू ने मेरा पीछा पकड़ा। लेकिन मैं होटल में ठहरा और वह वहीं के एक बंगाली सज्जन के पेइंगगेस्ट होकर रहे। आदमी जरा वैसे-से हैं, इसीलिए यह इन्तजाम। बोले, “उन सब अँगरेजी होटलों में क्या कहकर किस चीज का मांस खिला देता है! उससे पैसा देकर हिन्दू के घर में रहना अच्छा है।"

अपने नौकर प्रह्लाद को छोड़ आया हूँ, लेकिन न्यूटन को साथ ले आया हूँ। वह यहाँ आकर केकड़ों के पीछे खूब पड़ गया है।


अभी तक लाल मछली का कोई पता नहीं चला। यहाँ के भले लोगों में से किसी ने वह मछली नहीं देखी। जिन नूलियों के जाल में वे फंसी थीं, मैंने उनसे बातें कीं। उन लोगों ने तो कहा, “ऐसी घटना उनकी सात पुश्तों में कभी नहीं घटी। जाल खींचते समय उनके पानी में रहते ही उन लोगों ने मछली का अनोखा रंग देखकर समझा था कि यह कोई नई किस्म की मछली फँसी है। जाल को जमीन पर खींचकर खोलते ही और मछलियों की भीड़ में से वे लाल मछलियाँ एक ही साथ उछली और कूदती हुई पानी में जा रहीं। उनका कूदना बहुत कुछ मेंढकों-जैसा था और वह पूंछ पर टिककर बिलकुल खड़े होकर।" नूलियों ने शायद यह भी देखा था कि मछली की पूँछ दो हिस्सों में बँटी थी और पाँव-सी हो गई थी।


काश, कोई कैमरावाला आदमी उस समय रहा होता! मैं अपने साथ कैमरा ले आया हूँ। काम के कुछ अन्य औजार भी लाया हूँ। पता नहीं, इनके उपयोग का मौका लगेगा या नहीं। मेरा इरादा यहाँ सिर्फ सात दिन रहने का है। इसी अरसे में जो हो जाए!


कल होटल में एक जापानी सज्जन आए हैं। डाइनिंग रूम में परिचय हुआ। नाम है हामाकुरा। टूटी-फूटी अँगरेजी बोलते हैं, बड़े कष्ट से समझना पड़ता है। भाग्य से मैं अपना 'लिंगुआग्राफ' लेता आया था। इससे दो काम हुए भले आदमी से मजे में बातचीत की जा सकती है और उन्होंने भी मेरी वैज्ञानिक प्रतिभा को अच्छी तरह से जान लिया है। वह काम क्या करते हैं, यह नहीं जान पाया था। इस विषय में पूछने पर वह उलटा प्रश्न कर बैठते थे। इतना छिपाने का क्या कारण हो सकता है, नहीं समझ पाता। कल तीसरे पहर मेरी तरह वह भी समुद्र के किनारे टहलने के लिए गए थे। अकसर ही मैंने देखा, रुक-रुककर वह एकटक समुद्र की ओर ताक रहे हैं। सुना है, जापान में मोती का व्यापार होता है और जापानी मोती का नाम है। वह क्या इसी धन्धे के सिलसिले में आए हैं?


23 जनवरी

परसों रात से ही तरह-तरह की घटनाएँ घटने लगी हैं। जापानी सज्जन भी मेरे ही समगोत्री यानी वह भी वैज्ञानिक हैं और उनके गोपालपुर आने का क्या मतलब है-इन बातों का पता कैसे चला, पहले यह बता दूँ।


कल सवेरे रोज की तरह समद्र के किनारे जाकर नलियों का जाल खींचना देख रहा था। जाल में एक नए प्रकार का समुद्री जीव ऊपर आया।

किताब में इसकी तसवीर देखी थी, पर नाम नहीं याद आ रहा था। उसका कोई स्थानीय नाम है या नहीं, नूलियों से पूछने ही जा रहा था कि पीछे से हामाकुरा की आवाज सुनाई पड़ी, “रायन फिश!" वास्तव में लायन फिश।

मैंने खासा अवाक-सा होकर कहा, “आपको इन बातों में रुचि है, क्यों?"

वह सज्जन जरा हँसकर बोले, “यही मेरा पेशा है। मैं पच्चीस साल से सामुद्रिक प्राणितत्त्व पर गवेषणा कर रहा हूँ।"


यह जानकर मैंने फिर से उनसे गोपालपुर आने का कारण पूछा। हामाकुरा ने बताया, वह सिंगापुर से आ रहे हैं। वहीं समुद्र के किनारे गवेषणा कर रहे थे। एकाएक एक दिन वहाँ गोपालपुर में 'जामुपिनि फिश' की खबर पढ़कर उसे देखने की आशा में यहाँ चले आए।


'जामुपिनि' से मतलब ‘जंपिंग' का है, यह समझने में कठिनाई नहीं हुई। जापानी लोग संयुक्ताक्षर को तोड़कर किस तरह से दो अलग अक्षरों की तरह उच्चारण करते हैं, यह मैं इन कई दिनों में जान गया हूँ। हलंत भी उनकी भाषा में नहीं हैं और न ही 'ल' का प्रयोग। हामाकुरा के उच्चारण में इसीलिए सिंगापुर और गोपालपुर का उच्चारण हुआ-सिनगापुरो और गोपालपुरो। और मैं हो गया, पोरोफेसोरो शोनोकू।


जो भी हो, मैंने भी हामाकुरा से बताया, “गोपालपुर आने का मेरा भी एक ही उद्देश्य है। लेकिन जो रवैया देख रहा हूँ, उससे लग रहा है कि आने का कोई खास लाभ नहीं होगा।" हामाकुरा मेरी बात सुनकर क्या कहने जा रहा था, पर नहीं बोला। शायद हो कि भाषा के अभाव से ही उसका कहना अटक गया।


शाम के समय हम लोग रोज बरामदे पर बैठे रहते हैं। बरामदे से एक डग उतरते ही रेत और रेत पर सौ गज चलने के बाद ही समुद्र। कल तीसरे पहर मैं और हामाकुरा अगल-बगल डेकचेयर पर बैठे थे और एक आरा मछली का दाँत खरीद लाकर अविनाश बाबू कह रहे थे कि इसे घर में रखने से चोर नहीं आता। ऐसे में एक अजीब बात हो गई।


साँझ की धुंधली रोशनी में साफ ही देखा कि समुद्र के बीच से जाने कैसी-सी चीज निकली और दूसरे ही क्षण उसके ऊपर एक हरी रोशनी जल उठी।


अपनी जापानी भाषा में जाने क्या बोलकर हामाकुरा अपने कमरे में उछलकर चला गया। उसके बाद उस कमरे से खट-खट, पी-पी आदि तरह-तरह की आवाज आने लगी। देखा कि वह हरी रोशनी जलती है और बुझती है। उसके बाद एक समय वह जलती ही रह गई, बुझी नहीं।


इधर अविनाश बाबू उत्तेजित हो उठे। बोले, “यह तो गोया बायस्कोप देख रहा हूँ, साहब! यह हो क्या रहा है, सो तो कहिए? वह कौन-सी चीज है?"


इतने में हामाकुरा कमरे से निकल आया। उसे देखकर लगा कि वह बड़ा निश्चिन्त-सा लग रहा है। खुश भी। हरी रोशनी की तरफ उँगली दिखाते हुए बोला, “माइ शिप। तू गो दाउन। आनुदा उआता।"

समझ गया, वह सबमेरीन जैसा कछ है-अंडर वाटर यानी समन्दर के नीचे चलता है।

मैंने पूछा, “उसमें कौन है?"

हामाकुरा ने कहा, “तानाका। माइ फ्ररेनोदो।"

“योर फ्रेंड?"

हामाकुरा ने बार-बार सिर हिलाकर कहा, “हूँ-हूँ!"

“उइ तू–सानितिस। गो दाउन तू सुतादी राइफ आनूदा उआता।"


यानी हम दोनों साइंटिस्ट हैं। ‘गो डाउन टू स्टडी लाइफ अंडर वाटर'। समझ गया कि तानाका हामाकुरा का सहयोगी है। वे दोनों एक साथ समुद्र के अन्दर उतरकर समुद्री जीवों के बारे में खोजबीन करते हैं।

अब साफ देखने में आया कि जहाज हम लोगों की तरफ बढ़ आया है और उसकी रोशनी क्रमश: तेज हो रही है।


हामाकुरा बरामदे से बालू पर उतरा और समुद्र की ओर जाने लगा। हम दोनों ने उसका पीछा किया। जहाज के बारे में बड़ी उत्सुकता हो रही थी। समझ गया कि हामाकुरा इतने दिनों से इसी का इन्तजार कर रहा था। बालू पर से चलते हुए अविनाश बाबू ने फुसफुसाकर मेरे कानों में कहा, “मुझे आशा है, अपने बचाव के लिए आपके पास हथियार आदि हैं। मुझे लेकिन इनके रवैये अच्छे नहीं लग रहे हैं, या तो ये गुप्तचर हैं, या स्मगलर। यह मैं कहे देता हूँ।"


पानी पर से वह सबमेरीन जिस तरह से चला आया, उससे समझा, ऐमफिबियन है, यानी पानी पर भी चलता है, जमीन पर भी। पुरी का समुद्रतट रहा होता, तो इस जहाज को देखने के लिए हजारों आदमी जमा हो गए होते, लेकिन गोपालपुर में इस जहाज के आने की बात को जाना केवल मैंने और हामाकुरा ने।


आकार में वह जहाज हमारे होटल के कमरे से ज्यादा बड़ा नहीं था। बनावट में मछली से उसकी बहत कछ समानता है, गो कि मॅह उसका चिपटा है। नीचे तीन पहिए, दो ओर दो डैने और पूँछ की तरफ एक पतवार-सा देखा। कन्धे पर जो डंडा-सा है, वह पानी के अन्दर पेरिस्कोप का काम करता है। इसी डंडे के ऊपरी सिरे के पास वह हरी रोशनी है।


पानी को पार करके किनारे के पास पहुँचते ही जहाज रुका। उसकी दोनों बगल से काँटे-जैसी दो चीजें निकलीं, वह बालू में कुछ गहराई तक गड़ गईं। उसने जहाज को सखी के साथ मिट्टी से अटका दिया। समझ गया, अब वह हलकोरों से भी नहीं हटेगा।


उसके बाद देखा, जहाज के एक ओर का दरवाजा खुल गया। उसके अन्दर से चश्मा पहने एक नाटे कद का गोलमटोल खुशमिजाज आदमी उतरा। उतरकर उसने हामाकुरा से हाथ मिलाया फिर हमारी तरफ मुड़कर बार-बार घुटने झुकाकर अभिवादन करने लगा। इसी बीच हामाकुरा ने अपने सहयोगी से हमारा परिचय करा दिया।

अविनाश बाबू ने फुसफुसाकर कहा, “मैं तो यही जानता था कि अतिभक्ति चोर का लक्षण है। ये सज्जन बार-बार इतना झुक क्यों रहे हैं, बताइए।"


मैंने भी फुसफुसाकर कहा, “जापान में चोर, छिछोरे, साधु-संन्यासी सभी इसी तरह से झुकते हैं। इसमें सन्देह करने की कोई बात नहीं।"


समुद्र से होटल आया तो सारी बातें साफ-साफ मालूम हुईं। तानाका सिंगापुर में हामाकुरा के साथ था। वह गोपालपुर तक तमाम रास्ता समुद्र के नीचे ही नीचे आया है। हामाकुरा आकाश मार्ग से और स्थल पर होकर आया है। गोपालपुर को केन्द्र बनाकर वे दोनों समुद्र के नीचे उस लाल मछली की खोजबीन करेंगे।

मैंने पूछा, “मिस्टर तानाका पानी के नीचे-नीचे इतनी दूर तक आए, उन्होंने क्या वह लाल मछली एक भी नहीं देखी?"


तानाका हामाकुरा से भी कम अँगरेजी जानते थे। मैं अपने लिंगुआग्राफ की मदद से जान सका कि उन्हें लाल मछली का कहीं कोई चिह्न नहीं दिखाई पड़ा। लेकिन दूसरे जल-जीवों में उन्होंने एक अजीब हलचल-सी देखी। रंगून के पास से गुजरते हुए उन्होंने बहुत-सी मरी हुई मछलियाँ भी देखीं। उनमें से कुछ हंगर और कुछ सोंस भी थे। इसका कारण तानाका कुछ भी नहीं समझ सके। लेकिन उन्हें ऐसा ख्याल हुआ कि लाल मछली न सही, किसी जलचर प्राणी का उत्पात ही इन मौतों का कारण है। तानाका थके हुए थे। इसलिए उस समय प्रश्न करके उन्हें तंग नहीं किया।


अविनाश बाबू मेरे कमरे में आकर बोले, “समुद्र के नीचे-नीचे मजे में घूमते फिर रहे हैं। यह तो बड़ी अनोखी बात है! देखते-देखते क्या नहीं हुआ!"

भले आदमी को यह नहीं मालूम है कि सबमेरीन नाम की एक चीज का बहुत पहले ही आविष्कार हो चुका है। लोग तभी से पानी के नीचे-नीचे घूम रहे हैं। हाँ, पहले बहुत ज्यादा गहराई तक उतरना सम्भव नहीं था। वह शायद जापान के बनाए जहाज से सम्भव हुआ है।


अविनाश बाबू ने कहा, “सुनते हैं, इस जगह से बहुत जल्दी ही मन ऊबने लगता है, लेकिन अब लग रहा है कि मन लग जाएगा। मैं एक खासे रोमांच का अनुभव कर रहा हूँ। इतने पास से दो-दो जापानियों को एकसाथ देख पाऊँगा, यह कभी सोच भी नहीं सका था! मगर यह मछली-वछली की बात पर मुझे यकीन नहीं आता है साहब!"

"हुँ! लाल मछली! यह लाल मछली भी कोई नई चीज है भला! गिरिडिह में अपने मित्तिर के यहाँ ही तो एक गमले में भरी हुई कितनी तरह की मछलियाँ हैं। लाल, नीली। और कूदकर चलना ही ऐसी क्या आश्चर्य की बात है! कवै मछली को कान से चलते नहीं देखा है आप लोगों ने? वह भी तो एक प्रकार से कूदना ही हुआ।"


अविनाश बाबू के चले जाने के बाद खा-पी करके दो-एक घंटा एक लेख लिखने के काम को कुछ आगे बढ़ाकर फिर बाहर बरामदे पर जा खड़ा हुआ। रात के नौ बजे से बिजली की गड़बड़ी से बत्तियाँ गुल हो गई थी, इसलिए बैरा आकर कमरे में मोमबत्ती दे गया था। बाहर निकलने पर देखा, सब सुनसान अँधेरा। बरामदे के दूसरे छोर पर तानाका और हामाकुरा के कमरे थे-अगल-बगल वे दोनों ही कमरे अँधेरे थे, शायद दोनों सो गए थे। बड़ी दूर से, जाने कहाँ से ढोल की आवाज आ रही थी। शायद हो कि नूलियों का कोई परब-त्योहार हो। उसके सिवाय और जो शब्द था, वह समुद्र की लहरों का निश्वास।

मैं बरामदे से बालू पर उतरा। अभी भी चाँद नहीं निकला था।


हलकी-सी आहट हुई। मुड़कर देखा, न्यूटन कमरे से बरामदे में निकल आया है। उसकी नजर समुद्र की ओर थी। रोएँ खड़े हो गए थे और पूँछ फूलकर ऊँची उठ आई थी।


मेरी भी नजर समुद्र की ओर गई। चूँकि समुद्र के पानी में फासफोरस होता है, इसलिए वह अँधेरे में भी साफ दीखता है। लेकिन उस समय फासफोरस की उस नीली-सी आभा के अलावा भी दूसरी एक रोशनी दिखाई पड़ी। यह रोशनी जलते हुए कोयले जैसी लाल थी और वह लाल आभा किनारे से लगी यहाँ से वहाँ तक, जहाँ तक नजर जाती थी चली गई थी। आभा यह स्थिर भी नहीं थी, हिलती थी, चलती-सी लग रही थी, आगे-पीछे जा-आ रही थी।


उस लाली की तरफ देखकर न्यूटन गुरगुर करने लगा। मैंने जाकर झट उसे गोदी में उठा लिया, अपना सुपर टॉर्च लगा बाइनोकुलर लेकर कमरे का दरवाजा बन्द करके फिर बरामदे पर आया।


टॉर्च को जलाकर लाल आभा को निशाना बनाकर बाइनोकलर को आँखों में जैसे ही लगाया कि आँखें चौंधियानेवाला एक आश्चर्यजनक दृश्य दिखाई पड़ा। कतार की कतार, सीधे खड़े, देखने में मछली जैसे कोई जीव-उनमें से हर एक के बदन से लाल आभा छिटक रही थी और वे जैसे कौतूहल से सूखे की ओर ताक रहे थे।


लेकिन यह दृश्य मिनट-भर से ज्यादा देखने का सौभाग्य नहीं हुआ। मेरी रोशनी की वजह से या और किसी कारण से पता नहीं सारी मछलियाँ एक ही साथ हठात् पानी में चली गईं। उसी के साथ दूर तक फैली आग की वह लकीर भी गायब हो गई-सिर्फ फासफोरस की नीली आभा ही रह गई।


मैं और भी कुछ देर तक समुद्र की ओर ताकते रहने के बाद धीरे-धीरे सोचता हुआ अपने कमरे में चला आया। यह कैसे अजाने और अजूबे जीव का आविर्भाव हुआ? इतने दिनों तक ये कहाँ थे? इन्हीं में से एक के काटने के कारण वालटेयर में एक आदमी की जान गई। तो क्या ये सब आदमी के दुश्मन हैं? तानाका ने जिन मछलियों को समुद्र के नीचे मरा हुआ देखा, उनकी मौत के कारण भी यही हैं क्या?

रात काफी हो चुकी थी। कमरे में आकर सो गया। अच्छी नींद नहीं आई। उसकी एक वजह न्यूटन का बार-बार गुर्राना थी।


सबेरे अपने जापानी मित्रों को रातवाली घटना बताई। तानाका बोला, "तो लगता है, हमें ज्यादा भटकना नहीं पड़ेगा। वह सब बेशक आस ही पास हैं।" ।

मैंने ज़रा आगा-पीछा करके आखिरकार अपने मन की बात कह ही दी, “आप लोगों के उस जहाज में दो से ज्यादा लोग नहीं जा सकते?"


हामाकुरा ने कहा, "हम लोग छह आदमी तक उस जहाज से नीचे गए हैं। लेकिन ज्यादा दिन अन्दर रहना हो, तो चार जने से ज्यादा को नहीं लेना ही ठीक है।"


मैंने कहा, “आप लोगों को एतराज न हो तो मैं अपने बिल्ले को लेकर आपके साथ चलना चाहता हूँ। अपने खाने-पीने का प्रबन्ध हम कर लेंगे, आपको नहीं सोचना होगा।"

हामाकुरा न सिर्फ राजी हुआ, बल्कि खुश भी हुआ। तानाक ज़रा पुरमज़ाक आदमी है। बोला, “आपका यह यन्त्र साथ में रहे, तो शायद मछलियों की भाषा समझ में आ जाए।"


तय पाया कि कल, यानी दूसरे दिन सबेरे हम लोग रवाना होंगे। उन लोगों के पास सात दिन की खुराक थी। उतने दिनों तक हम लोग लगातार समुद्र के नीचे घूम सकेंगे।

खुशकिस्मती थी कि गोपालपुर आया था। और सौभाग्य से ही हामाकुरा यहाँ आया था। समय मिलता तो ऐसा एक जहाज बना लेना मेरे लिए नामुमकिन नहीं था। मगर बहरहाल जापानियों के इस जहाज के लिए भगवान को धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सका।


हमारे होटल की मैनेजर एक स्विस महिला थी। उससे कहा, "हमारे ये कमरे और किन्हीं को न दिए जाएँ।” इस भद्र महिला जैसा कौतूहलविहीन आदमी मैंने नहीं देखा। हम लोगों की ऐसी उत्तेजना, इतनी कल्पना-जल्पना, यहाँ तक कि पिछली रात लाल मछलियों के निकलने की सुनकर भी वह ज़रा भी विचलित न हुई या यों कहें, उसे ज़रा भी कौतूहल नहीं हुआ। वह बोली, “जितने दिनों तक रह चुके हो, उसका किराया चुका देने से, जो कई दिन नहीं रहोगे, उसका किराया मैं नहीं जोदूंगी। मैं यह किराया अभी इसीलिए ले लेना चाहती हँ कि कहीं समुद्र के पेट में ही तुम लोगों की समाधि न हो जाए।” अजीब थी वह स्त्री!

दोपहर में अविनाश बाबू आए। मुझे सामान सहेजते देखकर बोले, “क्यों जनाब, लौटने का मनसूबा गाँठ रहे हैं क्या? अजी, अभी-अभी तो खेल जमा है!"


मैं अविनाश बाबू के बारे में जरा किन्तु-परन्तु कर रहा था। लेकिन यह भी सोच रहा था कि अभी अविनाश बाबू के बारे में सोचने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने इसी बीच दो-एक बंगाली सज्जनों से काफी घनिष्ठता कर ली है, इसलिए यह भी नहीं कि मैं उन्हें अथाह मँझधार में छोड़े जा रहा हूँ।

मैंने अपनी तैयारी का कारण जो बताया तो अविनाश बाबू ज़रा देर के लिए गुम हो गए, उसके बाद एकबारगी हाथ-पैर पटककर बोले, “भीतर ही भीतर आपने यह मनसूबा कर रखा था! आप तो अच्छे खुदगर्ज आदमी हैं जनाब! यह प्रिविलेज सिर्फ आपको ही क्यों मिलेगा? आप वैज्ञानिक हो सकते हैं, मगर मछलियों की जानकारी आपको क्या है? मैं तो फिर भी ‘मछलीखोर' हूँ, चाहकर मछली खाता हूँ और आप तो प्रैक्टिकली मछली खाते ही नहीं।"


मैंने किसी प्रकार से उन्हें रोकथामकर कहा, “यदि आपको भी अपने साथ कर लूँ तो आप खुश होंगे?"

“बेशक! ऐसा मौका हाथ से कौन जाने देता है? मेरे बीवी नहीं है, बाल-बच्चे नहीं हैं, आखिर मुझे बंधन काहे का है? इससे आखिर कुछ करना होगा, लोगों को कम-से-कम यह कह सकूँगा कि ‘फारेन' गया था, सो वह मछली का मुल्क था कि आदमी का, यह कहने की क्या जरूरत है?"


हामाकुरा को अविनाश बाबू के बारे में कहा तो, वह भरमुँह हँसकर बोला, “वी जापनी तू-यु वेनेगारी तू–पारुफे केतु!"

यानी : “हम दो जापानी, तुम दो बंगाली, परफेक्ट!"

कल सबेरे हम लोगों का अभियान शुरू होगा। भाग्य में क्या है, भगवान जाने! लेकिन इतना जानता हूँ कि यह सुअवसर खोना गलत होता। और चाहे जो हो, एक नई दुनिया देखी जाएगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है।


24 जनवरी

ठीक बारह घंटे पहले हम समुद्र के नीचे उतरे हैं। यहाँ डायरी लिखने का सुयोग-सुविधा होगी या नहीं, पता न था। गया तो देखा, बड़े आराम से हूँ। इन्तजाम इतना अच्छा था और थोड़ी ही जगह में केबिन को इतने ढंग से प्लान करके बनाया गया था कि ज़रा देर के लिए भी भीड़ की घुटन नहीं महसूस हुई।


साँस लेने की कोई तकलीफ नहीं। खाने-पीने का इन्तजाम जापानी था। वह मुझसे नहीं चलेगा, इसलिए मैंने अपनी ‘वटिका इंडिका' की एक गोली से ही काम चला लिया। मेरी बनाई हुई यह गोली एक ही खा लें, तो दिनभर का खाना हो जाता है। जापानी लोग कच्ची मछली खाना पसन्द करते हैं, ये लोग भी वही खा रहे थे, इसलिए न्यूटन को बड़ी सुविधा हो गई थी। अविनाश बाबू ने आज साग-भाजी खाई, एक प्याला जापानी चाय का पिया। मैं समझ गया, इससे न तो उनका पेट भरा, न मना कहा। कल एक गोली मेरी वाली ही खा लेंगे, गो कि मुझे मालूम है, मेरी इस गोली का उन्हें ज़रा भी विश्वास नहीं है।


मैं अपने बारे में कह सकता हूँ कि जब से यहाँ आया हूँ, मेरे मन में खाने की बात ही नहीं आती, क्योंकि मेरा सारा मन केबिन की उस तिकोनी खिड़की पर लगा था।


जहाज की एक बड़ी ही तेज रोशनी ने बाहर प्रायः पचास गज की दूरी तक को प्रकाशमान कर दिया था और उस रोशनी से एक अनोखी, पल-पल बदलती हुई दुनिया ने मुझे दंग कर दिया था। दसेक मिनट हुए, हमारा जहाज रुका। तानाका और हामाकुरा पनडुब्बे की पोशाक पहनकर कुछ सामुद्रिक उद्भिदों के नमूने जमा करने के लिए केबिन से निकल गए थे। उनके इस चले जाने का मौका पाकर मैं डायरी लिखे ले रहा हूँ। अविनाश बाबू ने पूछा, “आपको वह पोशाक पहना दें तो आप बाहर निकल सकते हैं?” मैंने कहा, “क्यों नहीं निकल सकूँगा? उसमें तो बहादुरी की कोई बात नहीं है। पानी के अन्दर आसानी से चल-फिर सकने के लिए ही तो वह पोशाक है। आपको पहना दें तो आप भी चल-फिर सकते हैं।"


अविनाश बाबू ने अपने दोनों हाथों से दोनों कान मलते हुए कहा, “माफ कीजिए साहब. किसी बात की सीमा भी होती है। मैं इसी तरह मजे में हैं। चाहकर ऊब-इब करने का शौक मझे नहीं चर्राया है।"


सबेरे से हम लोगों ने समुद्र के नीचे कोई पचीस मील का चक्कर काटा। किनारे से खूब ज्यादा दूर नहीं गए क्योंकि मछलियाँ जब जाल में फंसी थीं, और परसों रात को भी जब उन्हें जमीन के ऊपर आते देखा, तो वे आसपास ही हैं, यह अंदाज किया जा सकता है।


हम लोग ज्यादा गहराई में भी नहीं गए। क्योंकि तीन-साढ़े तीन हजार फुट के नीचे सूरज की रोशनी नहीं पहुँचती, इसलिए वहाँ मछलियाँ प्रायः रहती ही नहीं हैं। कम-से-कम रंगीन मछलियाँ तो नहीं ही, क्योंकि सूरज की रोशनी ही मछलियों के रंग का कारण होती है।


इन बारह घंटों में कैसी-कैसी, कितनी अजीब मछलियाँ और उद्भिद देखे, उसका कोई लेखा ही नहीं। दस फुट नीचे पहुंचते ही 'जेली फिश' किस्म की मछलियाँ देखने को मिलीं। वह सब भी मछलियाँ हैं, अविनाश बाबू यह विश्वास ही नहीं करेंगे। कहने लगे, “पूँछ नहीं, माथा नहीं, चोइए नहीं, गलफरा नहींयों ही मछली कहिएगा?"

'प्लेंकटन' जातीय उद्भिद को देखकर अविनाश बाबू बोले, “आप इन सबको भी मछली कहकर ही चलाने को तैयार हैं क्या?"

मैंने उन्हें बताया, “यह सब समुद्री उद्भिद हैं। पेड़-पौधे। बहुत-सी मछलियाँ हैं, जो यही सब खाकर जीती हैं।"

अविनाश बाबू ने आँखें कपाल पर चढ़ाकर कहा, “यानी कि मछलियों में भी 'वेजेटेरियन' हैं। ताज्जुब है!"


तानाका उद्भिद संग्रह करके लौट आया और हम लोगों का जहाज फिर चलने लगा। झुंड की झुंड मछलियाँ हम लोगों की खिड़की के पास से जाने लगीं। एक बहुत बड़ी चिपटी मछली आगे आई और बड़ी उत्सुकता से हमारे केबिन की ओर देखने लगी। जहाज चल रहा है और वह मछली भी उसके साथ-साथ चल रही है, उसकी नजर हम लोगों की ओर थी। न्यूटन खिड़की के सामने की टेबिल पर चढ़कर काँच पर ठीक उस मछली के मुँह पर पंजा घिसने लगा। प्रायः पाँच मिनट तक इस तरह से चलते रहने के बाद वह मछली बगल से निकलकर गायब हो गई।


तानाका दिन में बीच-बीच में यह देखने के लिए सर्चलाइट बुझा दिया करता था कि स्वाभाविक रोशनी कितनी है। तीसरे पहर के बाद से रोशनी बुझाई नहीं गई।


घंटेभर पहले तानाका ने कहा, “यदि हजार फुट की गहराई में लाल मछली नहीं मिली तो हम उपकूल से और भी दूर, और भी गहराई में उतरेंगे। ऐसा भी हो सकता है कि यह मछली बिलकुल अँधेरे समुद्र की मछली हो।"

मैंने कहा, "लेकिन ये तो सूरज की रोशनी में निकल सकती हैं, इसका सबूत तो मिल चुका है।"


हामाकुरा ने गम्भीरता के साथ कहा, “मालूम है। जभी तो इसकी जाति समझने में कठिनाई हो रही है। यह नहीं लग रहा है कि आसानी से इसका पता चल सकेगा।"


तानाका अपने कैमरे से दनादन समुद्री जीवों की तसवीर खींचता चला जा रहा था। कुछ देर पहले दो हंगर एकबारगी खिड़की के पास आ पहुँचे थे। उनके बाए हए मुँह में दाँतों की पाँत देखकर सचमच ही डर लगता है।


अविनाश बाबू से कहा, "हंगर की पीठ पर वह जो तिकोने डैने-सी चीज देख रहे हैं, वह भी आदमी का खाद्य है। जी चाहे तो किसी चीनी रेस्टोरेंट में जाकर 'शार्क्स फिनसूप' खाकर आप देख सकते हैं।"


अविनाश बाबू ने कहा, “सो तो समझा। वैसा तो सुना है, साँड़ की पूँछ का भी सूप बनता है। लेकिन सोच देखिए, जिसने पहली बार इसे खाकर खाद्य का सर्टिफिकेट दिया, उसकी कितनी बहादुरी है! कछुए को देखकर क्या लगता है कि उसे भी खाया जा सकता है?" हमारी खिड़की से बाहर उस समय कछुओं का एक जोड़ा तैरता जा रहा था, “देखिए न, पाँव देखिए, सिर देखिए, खोली देखिए-जिसे अजीबोगरीब कहते हैं। मगर खाने में कैसा स्वादिष्ट!"


रात के साढ़े-आठ बज रहे थे। अविनाश बाबू ने इसी बीच दो-तीन बार जम्हाई ली। तानाका एक थर्मामीटर में पानी का ताप देख रहा था। हामाकुरा नोटबक खोलकर क्या तो लिख रहा था। केबिन के रेडियो में बड़े धीमे स्वर में एक मद्रासी गीत सुनाई पड़ रहा था। आज लाल मछली का कोई पता लग सकेगा, ऐसा नहीं लगता।


25 जनवरी, सबेरे 8 बजे

कल रात जो एक चंचल कर देनेवाली घटना हुई, उसे इसी वक्त लिख रक्खूँ।

हामाकुरा और तानाका बारी-बारी से जहाज चलाया करते हैं, क्योंकि एक आदमी के लिए यह काम ऊब का हो जाता है। मैं जिस समय की घटना लिख रहा हूँ, घड़ी में रात के साढ़े-ग्यारह बज रहे थे। हमारा जहाज सात सौ फुट की गहराई पर जमीन से चार हाथ ऊपर चल रहा था। कंट्रोल हामाकुरा के हाथ में था, तानाका अपने बंक पर विश्राम कर रहा था। अविनाश बाबू सो रहे थे और उनकी नाक इस जोर से बज रही थी कि बार-बार लग रहा था, इन्हें साथ नहीं ले आया होता तो अच्छा था। मेरी नजर खिड़की के बाहर थी। एक 'इलेक्ट्रिक ईल' मछली ने, कुछ देर हुई, हमारा साथ पकड़ा था। ऐसे में सर्चलाइट की रोशनी में देखा, समुद्र के धरातल पर कौन-सी चीज तो चकमक कर रही है।


मैंने हामाकुरा की ओर देखा। देखा, वह भी उस चकमक-सी चीज की ओर देख रहा है। उसके बाद देखा, स्टेयरिंग घुमाकर वह जहाज को उसी ओर ले जा रहा है। मैं खिड़की के करीब गया। देखा, वह चारेक हाथ लम्बी पीतल की एक तोप है। यह अंदाज करने में कोई कठिनाई नहीं हुई कि कभी वह किसी जहाज के साथ थी और जहाज के साथ ही पानी में डूब गई।

तो क्या उस जहाज का भग्नावशेष भी यहीं कहीं है?


मन-ही-मन एक खासी दबी हुई उत्तेजना महसूस की। तोप की शकल से यह साफ समझ में आया कि यह तीन-चार सौ साल पुरानी होगी। मुगल जहाज था या कि डच या ब्रिटिश जहाज?


हामाकुरा ने जहाज के स्टेयरिंग को फिर घुमाया। उसके साथ ही सर्चलाइट की रोशनी भी घूम गई। उसके घूमते ही वह पड़ा हुआ जहाज किसी विशाल समुद्री जीव के कंकाल-सा लगा। यहाँ मस्तूल, वहाँ पतवार, पिंजरे जैसा कुछ घिसा हुआ इस्पात का ढाँचा, माटी में यहाँ-वहाँ बिखरा हुआ धातु का भिन्न-भिन्न आकार का सामान। पुराने जहाज के डूबने का तमाम सबूत बिखरा हुआ। दुर्घटना की वजह आँधी होगी कि लड़ाई, पता नहीं। जानने का उपाय भी नहीं।


इस बीच तानाका बिस्तर से उतरा। खिड़की के सामने खड़े होकर साँस रोके बाहर का दृश्य देख रहा था।

मैंने अविनाश बाबू को जगाया। दृश्य देखकर उनकी आँखें दही-बड़ा हो गईं।


लंगर डालकर हामाकुरा ने जहाज को माटी पर खड़ा किया। अविनाश बाबू ने कहा, “यह तो गोया आख्योपन्यास का कोई दृश्य देख रहा हूँ, साहब! अपने को कभी सिंदबाद लगता है, कभी अलीबाबा।"


अलीबाबा का नाम उच्चारण करते ही मुझे एक बात याद आई। उस डूबे जहाज के साथ कुछ धन-रत्न भी क्या समुद्र में नहीं डूबा होगा? व्यापारी जहाज हो तो सोने के सिक्के जरूर होंगे और वे सिक्के तो जहाज के साथ ही डूबे होंगे और वह चीज जंग लगकर खराब होनेवाली नहीं।


मैंने जापानियों के स्वभाव में भी गहरी उत्तेजना देखी। दोनों ने ज़रा देर तक आपस में जाने क्या बातें कीं। उसके बाद हामाकुरा ने कहा, “वी गो आउट। यू कम?"


बात से मैंने समझा, जो सुबह मैं कह रहा था, वही इन लोगों ने भी किया है। वे लोग एक बार चक्कर काटकर देख लेना चाह रहे थे कि वास्तव में कुछ धन-रत्न है या नहीं।


हम लोगों में अब तक जो बातें हो रही थीं, अविनाश बाबू ने समझी नहीं। एकाएक उसे भापकर पलक मारने-भर की देर में वह एक नए आदमी हो गए।


“रत्न, मुहर, सोना, रूपा-यह सब क्या कह रहे हैं आप लोग? यह भी सम्भव है भला? इतने दिनों से पानी के अन्दर पड़ा है, बरबाद नहीं हुआ होगा! चाहें तो हम ले सकते हैं? लेने से वह हम लोगों का हो जाएगा? उफू! आप क्या कह रहे हैं, कह क्या रहे हैं आप?"


मैंने अविनाश बाबू को ज़रा शान्त करते हुए कहा, “इतने जोश में मत आइए। इसकी कोई गारंटी नहीं है। यह तो महज अंदाज है हम लोगों का। है या नहीं है, यह ये दोनों जाकर देखेंगे।"

"सिर्फ वही दोनों क्यों, हम लोग नहीं जाएँगे?" मैं तो दंग रह गया। अविनाश बाबू कह क्या रहे हैं!

मैंने कहा, “आप जा सकेंगे उस गहराई में? हंगरों के बीच? डुब्बे की पोशाक पहनकर?"

"बेशक जा सकूँगा!" अविनाश बाबू चिल्लाकर उछल पड़े। धन का लोभ उनके जैसे मामूली और डरपोक आदमी के मन में इतना साहस ला सकता है, यह मैं सोच नहीं सका था।

करता तो क्या? न्यूटन को छोड़कर जाने का मेरे लिए उपाय नहीं था और फिर बात थी कि धनरत्न हैं भी या नहीं, क्या ठीक है? मुझे उसका वैसा लोभ भी नहीं। मैंने हामाकुरा से कहा, “मेरे मित्र आप लोगों के साथ जाएँगे, मैं केबिन में ही रहूँगा।"


दस मिनट के अन्दर डुब्बे की पोशाक पहनकर तीनों आदमी निकल गए। कछ ही सेकंड में मैंने उन लोगों को खिड़की की राह उस टूटे जहाज के मलबे की ओर जाते देखा। तीनों एडीचोटी एक ही पोशाक से ढंके थे, इसलिए उन्हें अलग-अलग पहचानना कठिन था। लेकिन उनमें से जो सबसे ज्यादा हाथ-पैर पटक रहे थे, वही अविनाश बाबू हैं, यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता था। और भी पाँचेक मिनट के बाद देखा, तीनों माटी पर पहुँचे और नीचे की ओर नजर गड़ाए मलबे के इधर-उधर घूमने लगे। मैंने अविनाश बाबू को एक बार झुककर माटी टटोलते भी देखा।।


उसके बाद जो कुछ हुआ, उसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था। एकाएक अनुभव किया कि पानी में एक भयानक विस्फोट होने के कारण हमारा जहाज भयंकर रूप से हिल उठा। और उसके साथ उन तीनों ही डुब्बों का शरीर छिटककर पानी में डूबते-उतराते हमारे जहाज की ओर चला आया। चारों ओर की मछलियों में भी बदहवासी के लक्षण देखकर समझा कि बहुत ही अस्वाभाविक कुछ हुआ है।


दोनों जापानी और खास करके अविनाश बाबू के लिए बहुत ही बेचैनी महसूस कर रहा था। उसके बाद जब देखा कि तीनों ही किसी तरह से सम्हलकर जहाज की ओर आ रहे हैं, तो कुछ निश्चिन्त हुआ।


हामाकुरा और तानाका अविनाश बाबू को धर-पकड़कर केबिन में आए। उन लोगों ने जब पोशाक बदली, तो अविनाश बाबू का उड़ा हुआ चेहरा देखकर उनके मन की हालत को मैंने खूब समझा! वह बिस्तर पर बैठकर हाँफते हुए बोले, “मेरी जनमपत्री में लिखा जरूर था कि इकसठ साल की उम्र में ग्रहदशा है। मगर वह ग्रहदशा ऐसी है, यह नहीं जानता था।"


मेरे पास मेरी ही बनाई हुई एक दवा थी, स्नायु को तेज करने की। उसे खाकर पाँच ही मिनट में अविनाश बाबू बहुत कुछ चंगे-से हो उठे। उसके बाद जहाज भी चलने लगा। कहना फिजूल है, इतने थोड़े समय में धनरत्न की खोज कोई भी नहीं कर पाया। लेकिन उसके लिए अब किसी को अफसोस या चिन्ता नहीं थी। सबको उस गजब के विस्फोट का खयाल हो रहा था। मैंने कहा, “कोई ह्वेल मछली आसपास चले तो ऐसा आलोड़न हो सकता है क्या?"


तानाका ने हँसकर कहा, “हेल अगर पागल होकर पानी में वोल्ट भी खाए, तो भी ठीक आसपास के पानी को छोड़कर और कहीं ऐसा आलोड़न नहीं हो सकता।"

अविनाश बाबू ने कहा, “भूकम्प की तरह जलकम्प भी होता है क्या, साहब? मुझे तो वैसा ही लगा।"


असल में आसपास हुआ होता, तो शायद कारण समझ में आता। विस्फोट काफी दूर पर ही हुआ था। फिर भी उसकी कैसी धमक! कहीं आसपास में होता तो, चूँकि मजबूत बना है, इसलिए जहाज अगर बच भी जाता, लेकिन इन तीन आदमियों की क्या दशा होती, यह सोचते भी डर लगता है।


जहाज चलने के आधे घंटे के बाद ही समद्र के पानी में विस्फोट के तरह-तरह के चिह्न देखना शुरू किया। असंख्य छोटी मछलियों के सिवाय सात मरे हंगर भी हमें रोशनी में दिखाई दिए। एक आक्टोपस को बेचैनी से तड़प-तड़पकर अपनी आँखों के सामने मरते देखा। इसके सिवाय पानी के ऊपर की ओर से असंख्य जेली फिश, स्टार फिश, ईल तथा अन्य प्रकार की मरी मछलियों को धीरे-धीरे नीचे आते देखा। हमारी रोशनी के दायरे में आने से ही दिखाई दे रही थीं।


मैंने हामाकुरा से कहा, "लगता है, पानी का ताप बढ़ा है या पानी में ऐसा कुछ मिल गया है, जो मछली और उद्भिदों के लिए घातक है।"

अपने यन्त्र से पानी का ताप नापकर तानाका ने कहा, “47 डिग्री सेंटीग्रेड। यानी जितने ताप में ये जीव जी सकते हैं, उससे दुगुना।"

अजीब है! ऐसा कैसे हो गया? इसका एकमात्र कारण यही हो सकता है कि पानी के नीचे कोई ज्वालामुखी था, जिसका मुँह अब तक बन्द था। आज वह फट गया और उसी से ऐसा हआ। इसके सिवाय और तो कोई कारण नहीं दिखाई देता।


26 जनवरी, रात के 12 बजे

शाम से ही हमारी पनडुब्बी का रेडियो चल रहा है। दिल्ली, टोकियो, लन्दन और मॉस्को की खबरें पकड़ी गईं। फिलिपाईन के मनीला तट पर, अफ्रीका के केपटाउन के समुद्र तट पर, भारत में कोचीन के समुद्री किनारे पर, रायोडीजेनेरो के समुद्र तट पर और केलिफोर्निया के मशहूर मैलीबू बीच में लाल मछलियाँ दिखाई पड़ी हैं। ऐसी खबर है कि कुल मिलाकर एक सौ तीस आदमियों की जानें इस खूखार मछली के काटने से गईं। सारी दुनिया में तहलका है और वैज्ञानिकों के मन में आखिरी आश्चर्य हो रहा है। बहुतेरे समुद्र-विद्या विशारदों ने गवेषणा शुरू कर दी है। जानें कब कहाँ यह लहू पीनेवाली लाल मछलियाँ निकल आएँ, इस खौफ से समुद्र में नहाना बन्द-सा हो गया है। यहाँ तक कि जल-मार्ग से यातायात बहुत कम हो गया है, यद्यपि अभी तक ऐसी कोई खबर नहीं मिली है कि उस मछली ने नाव या जहाज पर चढ़कर किसी आदमी को काटा हो। कहाँ से और कैसे इस अजीब जीव का उद्भव हुआ, यह अभी तक कोई नहीं बता सका। दुनिया में ऐसे आकस्मिक ढंग से किसी प्राणी का आविर्भाव पिछले कई हजार वर्षों में हुआ है, इसकी कोई नजीर नहीं मिलती।


इस बीच हम लोग पाँच बजे के करीब एक बार पानी के ऊपर उठे थे। हम लोग गोपालपुर से प्रायः एक सौ मील दक्षिण चले आए हैं। हमारी पनडुब्बी समुद्र-तट से बीस गज पानी की ओर रखी गई थी। जमीन पर कहीं भी किसी बस्ती पर नजर नहीं पड़ी। सामने बालू, पीछे झाऊ का जंगल, और भी पीछे पहाड़ के सिवाय और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता।


न्यूटनसहित हम चारों व्यक्तियों ने कुछ देर तक जाकर सूखे पर पायचारी की। विस्फोट के बारे में हम सभी लोग सोच रहे थे, यहाँ तक कि अविनाश बाबू भी अपनी राय देने से बाज नहीं आ रहे हैं। एक बार बोले, “बाहर से किसी ने लक्ष्य करके बम-वम तो नहीं फेंका?"


अविनाश बाब जो बहत बेवकफी-सी कर रहे थे, सो नहीं। लेकिन पानी में बम किसलिए? समुद्र के अन्दर किसका शत्रु रह रहा है? पानी की मछली और उद्भिदों पर भला किसे इतना आक्रोश होगा?

आधे घंटे तक खुली हवा में पायचारी करके हम लोग पनडुब्बी में लौट आए।


पानी के अन्दर जहाँ तक सूरज की रोशनी पहुँचती है, वहाँ लाल मछली का सुराग नहीं लगा, इसलिए हम लोगों ने तय किया कि किनारे से खासी दूर तक जाकर और भी गहरे पानी में उतरकर खोज करेंगे। बहुतों को पता है कि समुद्र की सबसे ज्यादा गहराई कितनी तक हो सकती है। प्रशान्त महासागर में कहीं-कहीं गहराई छह मील से भी ज्यादा है। यानी पूरा माउंट एवरेस्ट डूब जाने के बाद भी उसके ऊपर दो हजार फुट पानी रहेगा!

हम लोग कम-से-कम दस हजार फुट यानी प्रायः दो मील नीचे उतरेंगे, यह सोचा। इससे ज्यादा नीचे उतरने में पानी का जो दबाव होगा उसमें हमें अपनी पनडुब्बी को टिकाए रखना मुश्किल होगा।


अभी हम सब पाँच हजार फुट नीचे चल रहे थे। यहाँ सदा रात है। दोपहर का सूरज यदि ठीक माथे पर भी रहे, तो भी उसकी ज़रा भी रोशनी यहाँ नहीं पहुंचेगी।


यहाँ उद्भिद का नाम भी नहीं। क्योंकि सूरज की रोशनी के बिना वे पैदा ही नहीं हो सकते। लिहाजा प्रवाल, प्लैंकटन इत्यादि की जो शोभा अभी तक हमें घेरे रहती थी, अब उसके दर्शन नहीं मिलते। यहाँ हमें घेरे हुए है पानी में डूबा हुआ परत-दर-परत पत्थर का पहाड़। हम लोग इन्हीं पहाड़ों के पास से चल रहे थे। नीचे सतह पर बालू और पत्थर के चूरे। और उन पर या तो स्थिर बैठे हैं या चल-फिर रहे हैं केकड़ा या घोंघा-जातीय जीव। पहाड़ों पर 'क्लैम' किस्म के घोंघे गोंयठे की भाँति अटके थे। एक तरह का खौफनाक केकड़ा देखा, वे रण-पार जैसे लम्बे-लम्बे पाँव बढ़ाकर माटी पर चल रहे थे। इन जीवों में से कोई भी उद्भिद पर जीनेवाले नहीं हैं। ये या तो आपस में ही एक-दूसरे को खा जाते हैं या जब दूसरा कोई समुद्री जीव मरकर नीचे आता है, तो उसे खाते हैं। जो ऐसा करते हैं, उन्हें समुद्री गिद्ध कहें तो बहुत बड़ी भूल न होगी।


तानाका अभी जहाज चला रहा था। इससे पहले दोनों ही जापानियों को खुशमिजाज देखा था, अभी दोनों गम्भीर थे। सर्चलाइट हर घड़ी जल ही रही थी। एक बार बझाई गई थी। लगा, जैसे अन्धकप में हैं। लेकिन बत्ती बझाने से एक बात होती है। अँधेरे में चलना-फिरना पड़ता है, इसीलिए शायद किसी-किसी मछली के बदन से रोशनी निकलती है। उनमें से किसी-किसी का रंग बड़ा बेहतरीन होता है। यह रोशनी बिलकुल 'नियन लाइट' जैसी है। एक मछली का नाम ही नियन है। जहाज की रोशनी बुझाने पर ऐसी दो-एक मछलियों को पानी में प्रकाश की रेखा खींचते हुए चलते देखा गया। यों, इस गहरे पानी के जितने भी जीव हैं, उनके बदन के रंग की कोई बहार नहीं होती। ज्यादातर या तो सफेद होते हैं या काले।

अविनाश बाबू ने कहा, “सारी दुनिया पर मौत की छाया-सी पड़ रही है, लगता है। है न?"


बात उचित है। शहर, सभ्यता, राह-बाट, घर-द्वार, लोगजन-इन सबों से लाख मील दूर और लाख साल पहले के किसी आदिम विभीषिका भरे जगत में आ निकले हैं हम। ताज्जुब की बात यही है कि यह जगत दरअसल हमारा समसामयिक है और यहाँ भी जन्म है, मृत्यु है, खाना है, सोना है, संग्राम है, समस्या है। लेकिन वह सब आदिम किस्म का ही, जैसा सच ही लाख साल पहले था।

जानें क्या कुछ देखकर तानाका चिल्ला पड़ा।

लिखना बन्द किया।


ग्यारह हजार फुट नीचे से हम फिर ऊपर आने लगे। हमारा अभियान समाप्त हुआ। हम सभी अभी तक बड़ी मायूसी की हालत में हैं। इस हालत से निकलने और मन के विस्मय को दूर होने में काफी कुछ समय लगेगा। मेरी 'नार्वाइटा' गोली ने अच्छा काम किया। मैं बैठकर अभी जो लिख पा रहा हूँ, वह भी उस गोली की ही बदौलत।


इसके पहले दिन की डायरी के अन्त की ओर मैंने लिखा था, खिड़की से जाने क्या देखकर तो तानाका चिल्ला उठा था। उस चीख को सुनकर हम सभी खिड़की पर प्रायः जा लुढ़के।


जापानी भाषा में तानाका ने क्या कुछ कहा, जिसे सुनकर हामाकुरा ने सर्चलाइट को बुझा दिया। सर्चलाइट के बुझते ही एक गजब का दृश्य हमें दिखाई दिया।


पहले ही लिख चुका हूँ, हमारे चारों ओर समुद्र के नीचे पहाड़ ही पहाड़ फैले थे। ऐसे दो पहाड़ों के बीच काफी कुछ दूर पर (समुद्र के नीचे दूरी का निश्चय करना कठिन है) हमने अग्निकुंड-सा जलते देखा। वह रोशनी आग की लपटों-जैसी ही चंचल थी और उसका रंग उन लाल मछलियों-जैसा ही था।


तानाका ने पनडुब्बी के स्टेयरिंग को घुमाया। हम समझ गए कि हम लोग उसी ओर ले जाए जा रहे हैं। अब सर्चलाइट जलाने की जरूरत नहीं थी। वही रोशनी हमें रास्ता दिखाने लगी। इसके सिवा हम अपनी मौजूदगी जितना कम जाहिर होने दें, शायद उतना ही अच्छा रहे।


मेरी आस्तीन को पकड़कर अविनाश बाबू ने दबे गले से कहा, “मिलटन के 'पैराडाइज़ लास्ट' की याद है? उसमें नरक का जो वर्णन है, यह तो बहुत कुछ वैसा ही है।"

अपना बाइनोकुलर निकालकर हामाकुरा की ओर बढ़ाते हुए मैंने कहा, "देखिएगा?" वह बोला, “यू रुक।"


बाइनोकुलर आँखों में लगाते ही आग का वह कुंड नजदीक आ गया। देखा, वह आग नहीं, मछलियों का मेला है। हजारों-हजार लाल मछलियाँ वहाँ गोलाई में घूम रही थीं, चक्कर काट रही थीं, नीचे-ऊपर आ-जा रही थीं। उनका रंग लाल है, ऐसा कहना गलत होगा। दरअसल उनके बदन से एक लाल आभा छिटक रही थी इसीलिए वह सब दूर से देखने में आग के एक कुंड-सा लग रही थीं।


पहले इस दृश्य का बहुत-सा भाग पहाड़ के अन्दर घुसा हुआ था। हमारी पनडुब्बी जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगी, लाल मछलियों का वह जगत वैसे ही वैसे साफ दिखाई देने लगा।


ठीक दस मिनट चलने के बाद हम लोग पहाड़ों से बाहर एकबारगी खुली जगह में पहुंच गए। मछलियों की भीड़ अभी भी हम लोगों से बीस-पचीस गज के फासले पर थी। लेकिन अब आगे बढ़ने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि हमारी निगाहों के सामने कोई रुकावट नहीं थी। और यह भी लग रहा था कि इस अनोखे और अलौकिक दृश्य को ज़रा दूर से ही देखा जाए।


मछलियों की गिनती करने की ताकत नहीं थी, जरूरत भी नहीं। एक से दूसरी का कोई फर्क नहीं था, लिहाजा उनमें से किसी एक का वर्णन करने से ही काम चल जाएगा।


मछली कहने से हम आमतौर से जिस चीज को समझते हैं, यह ठीक वह चीज नहीं। इनके कन्धे के दोनों ओर डैने की जगह जो चीज हैं, उनसे आदमी के हाथों की समानता है। और ये, उनसे हाथों का ही काम ले रही हैं। पूँछ के दो हिस्से जरूर हो गए हैं, लेकिन बँटकर वह पूँछ नहीं रह गई है। वह दो पाँव-सी बन गई है। सबसे अचरज की बात यह थी कि इनकी आँखें मछलियों-जैसी खुली नहीं रहतीं, इनमें आदमी की आँखों की तरह पलकें गिरती हैं।


इनकी हलचल का भी एक अंदाज लगाया जा सकता है, वह फिर बताता है। उससे पहले यह कहना है कि ये आपस में जो व्यवहार कर रही हैं, उससे यह साफ धारणा होती है कि ये बात करती हैं या इनमें परस्पर कम-से-कम भावों का आदान-प्रदान चलता है।


हाथ हिलाकर, सिर हिलाकर वह सब जैसा कर रही थीं, वैसा और कोई जलचर जीव कभी करता है, यह मुझे नहीं मालूम। तानाका और हामाकुरा भी इस बात में मुझसे सहमत हुए।


इनकी सारी हरकतें जिस चीज को घेरकर हो रही थीं, वह एक अजीब-सी गोलाकार चीज थी। वह गोलक आकार में हमारे जहाज का लगभग आधा होगा। वह किस चीज का बना है, समझना कठिन है, गरचे इसमें सन्देह नहीं कि वह धातु का बना है। वह गोलक समुद्र की माटी पर तीन साफ और तिरछी खूटियों पर खड़ा था।


एक चीज गौर करने की और थी कि वहाँ उन लाल मछलियों के सिवा दसरे किसी जीवित जीव का नाम भी नहीं था। जो था. वह था मछलियों की भीड़ से कुछ दूर पर पहाड़-जैसा एक कंकाल । समझने में दिक्कत नहीं हुई कि वह कंकाल एक ह्वेल मछली का था। इस विशाल मछली की ऐसी गत कैसे हुई? उस सवाल का एक ही जवाब दिमाग में आता है, बित्ताभर की इन मछलियों ने ही उस ह्वेल को खा लिया है!


उन लाल मछलियों के पीछे जो पहाड़ था, उसके चेहरे में भी एक आश्चर्यजनक विशेषता थी। अन्य पहाड़ों की तरह यह ऊबड़खाबड़ नहीं था। बड़ी कारीगरी के साथ एक ही साथ उसे सुन्दर और रहने योग्य बनाया गया था। उस पर कतार से एक के बाद दूसरी सुरंगें काटी गई थीं, जो पहाड़ के अन्दर चली गई थीं। उन सुरंगों के अन्दर अँधेरा नहीं, सबमें रोशनी का इन्तजाम था। यह रोशनी लाल थी। यानी यहाँ का सब लाल ही लाल! यह सब देखते-देखते मेरे दिमाग के अन्दर न जाने कैसा तो होने लगा। आँखें चौंधिया जरूर गई थीं, पर दिमाग का यह हाल उसकी वजह से नहीं था। मन में एकाएक अजीब धारणा पैदा हो जाने का ही यह नतीजा था।


ये अगर पृथ्वी के जीव न हों? यदि ये किसी और ग्रह से दुनिया में आए हों? शायद हो कि अपने ग्रह में वे अब अंट नहीं पा रही हैं, इसलिए धरती पर बसने के लिए आई हैं?


हामाकुरा से यह बात कही, तो वह बोल उठा, “वांदरफुरु? वांदरफुरु!" मुझे खुद भी यह ख्याल वंडरफुल लगा था। यही नहीं, यह मुमकिन भी है। यह जीव धरती पर नहीं पैदा हो सकते। होते, तो अब तक आदमियों के लिए अजाने नहीं रहते। कारण खास करके-ये तो सिर्फ पानी में ही नहीं रहते, ये उभयचर हैं। ये सूखे पर जाकर आदमियों को मार सकते हैं, सूखे में चलकर पानी में आ सकते हैं।


हामाकुरा अचानक बोल उठा, “ये सब मुँह से कोई आवाज कर रही हैं या नहीं और उस आवाज के कोई मायने हैं या नहीं, यह जानना जरूरी है। सोंस सीटी बजाता है, यह शायद आपको मालूम है। उस सीटी को रेकर्ड करके यह जाना गया है कि वह एक भाषा है। वे आपस में बातें करते हैं, मन के भाव को जाहिर करते हैं। ये भी शायद वही कर रही हों!"


यह कहकर हामाकुरा ने केबिन की दीवार का एक छोटा-सा दरवाजा खोलकर उसके अन्दर से हेडफोन-जैसा कुछ निकालकर अपने कान में डाला। उसके बाद टेबिल पर बहुत-से बटनों में से दो-एक को इधर-उधर करते ही उसके चेहरे पर आश्चर्य और उमंग का भाव फूट पड़ा। उसके बाद हेडफोन खोलकर मुझे देते हुए उसने कहा, “सुनिए।"


उसे कान में लगाते ही तरह-तरह की अजीब आवाज सुनने को मिली। उनमें से एक विशेष शब्द बार-बार हो रहा था क्ली-क्ली-क्ली-क्ली-क्ली। यह सिर्फ शब्द है कि मायने भी हैं?


देखा, इसी बीच अविनाश बाबू मेरे लिंगुआग्राफ को निकालकर मेरी ओर बढ़ाए बैठे हैं। ऐसी अक्ल से तो वह सहज ही मेरे सहायक बन सकते हैं।

लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। किसी शब्द का भी कोई अर्थ मेरे यन्त्र में नहीं लिखा गया। मेरा यन्त्र खराब नहीं हुआ था। जापानी भाषा के तो धड़ाधड़ अनुवाद होते जा रहे थे। तो, क्या हुआ?


हामाकुरा ने कहा, “इसका मतलब एकमात्र यही हो सकता है कि वे जो बोल रही हैं, उनका प्रतिशब्द हमारी भाषा में नहीं है। यानी उनकी भाषा और उनके भाव दोनों ही आदमी से जुदा हैं। इससे और भी ज्यादा यह लगता है, ये दूसरे ग्रह के जीव हैं।"

यन्त्र को रख दिया। क्या बोल रही हैं वे, यह जानने से वे कर क्या रही हैं, यह देखना अच्छा है।

इन मछलियों की नजर शायद उतनी पैनी नहीं होती। क्योंकि हमारे जहाज को वे अभी तक देख नहीं सकी थीं।


यही बात है? या कि किसी कारण से उनमें ऐसी एक हलचल हुई है कि उन्हें इसका खयाल ही नहीं कि उनके आसपास क्या है, क्या नहीं है। बिना किसी वजह के किसी जीव में ऐसी हलचल हो सकती है, यह विश्वास नहीं होता।


यह सोचते हुए ही मैंने उन मछलियों में एक परिवर्तन देखा। अचानक वे दो दलों में बँट गई। उसके बाद दोनों दल दो ओर जाकर उस गोलक को जैसे धक्का मारकर हटाने की कोशिश करने लगा। फिर देखा, उन्होंने गोलक को चारों ओर से घेर लिया और उसे ठेलने लगीं।


ऐसा उन्होंने कोई पाँच मिनट तक किया। उसके बाद ही मैंने एक मार्मिक घटना घटते देखी। दल में से एक-एक मछली छटपट करती हुई बेजान-सी होकर माटी पर गिरने लगी। एकाएक कोई जैसे उनकी प्राण-शक्ति का हरण कर ले रहा हो। वह थकावट है या बीमारी या और कुछ?

ज़रा-सा सोचते ही सारी बात बिजली-सी मेरे दिमाग में चमक गई।


ये उभयचर प्राणी किसी दूसरे ग्रह से यहाँ बसने के लिए आए हैं। यहाँ पानी का हिस्सा ज्यादा है, इसलिए ये पानी में ही उतरे हैं या शायद हो कि पानी में ही रहने के लिए आए हैं। उसके बाद या तो पानी का ताप या पानी की कोई गैस या वैसी ही किसी चीज की कमी या अधिकता ने उनके जीने की राह में बाधा खड़ी की है। इसीलिए इनमें से कुछ सूखे में यह देखने गए थे कि वहाँ रहा जा सकता है या नहीं। सूखे में इन्होंने आदमी को देखा। हो सकता है, इन्होंने आदमी को शत्रु समझा हो, इसीलिए कुछ को काटकर या काँटा गड़ाकर मार डाला। उसके बाद पानी में आकर उन्होंने समझा, धरती पर रहने से वे ज्यादा दिन जी नहीं सकेंगे। बहुत सम्भव है, वे उस लाल गोलक से ही आए थे और उसी में लौट जाना चाहते हैं। बदकिस्मती से वह गोलक माटी में इस कदर धंस उठने लगा। उस विस्फोट के चलते पानी के दवाव ने हमारे जहाज को धक्का दिया और उस धक्के से जहाज फुटबाल की तरह छिटककर पीछे के पहाड़ से जा लगा।

उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।


जब होश आया तो समझा, न्यूटन मेरा कान चाट रहा है। केबिन के फर्श पर से उठा तो कन्धे पर एक दर्द महसूस किया। देखा, हामाकुरा तानाका के सिर पर पट्टी बाँध रहा है। अविनाश बाबू छिटककर एक बिछावन पर जा गिरे थे, इसी से शायद उन्हें वैसी चोट नहीं लगी। लगा, वह मजे में ही सो रहे हैं। कन्धे पर हलका-सा दबाव डालते ही धड़कड़ाकर उठ बैठे और आँखें बड़ी-बड़ी करके कहा, “एक्स-रे में क्या निकला?" मैं समझ गया, सपने में वह देख रहे थे कि उनकी हड्डी-वड्डी टूट गई है।


जहाज ऊपर की ओर उठ रहा था। कारीगरी में जापानियों की गजब की बहादुरी है। इतने बड़े एक धक्के से जहाज को कोई नुकसान नहीं हुआ। बाहर शायद कुछ हुआ हो, पर वह उतना खतरनाक जरूर नहीं है। भीतर सिर्फ प्लास्टिक का एक गिलास उलटा था, जिससे मेरे बिस्तर पर थोड़ा-सा पानी गिर गया था। बस!


हामाकुरा ने कहा, “हम लोगों ने पहली बार जिस धक्के का अनुभव किया था, वह शायद एक दूसरे गोलक का विस्फोट था।"

मैंने कहा, “इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं। मुझे लगता है, ये सबके सब एक ही साथ, जहाँ से आई थीं, वहीं लौटी जा रही हैं।"

यह सब किस ग्रह से आई थीं, इसका कभी पता भी चलेगा?


शायद नहीं। लेकिन दूसरे ग्रह की ये लाल मछलियाँ विज्ञान में कितना आगे बढ़ गई हैं, यह सोचकर आश्चर्य होता है। तानाका ने इन मछलियों की बहुत-सी तसवीरें ली थीं। मैं जब बेहोश पड़ा था, उस समय, जहाज को खोलने से पहले हामाकुरा बाहर निकलकर दो मरी मछलियों का नमूना ले आया था। बात दरअसल यह कि हमारा यह अभियान नाकामयाब नहीं रहा।


अविनाश बाबू की ओर ताककर देखा, वह अनमने-से खिड़की से बाहर देखते हुए गुनगुन करके गा रहे हैं। मैंने कहा, “समुद्र के अन्दर का यह अभियान आपके लिए बड़ा मजेदार रहा, लगता है।"

अविनाश बाबू ने कहा, “मछली जैसी मजेदार चीज है, मछली की दुनिया वैसी मजेदार होगी तो क्या आश्चर्य है।'

“मुझे तो लग रहा है, मेरे ज्ञान का भंडार और भी बहुत भर गया।"

“आप सोच रहे हैं ज्ञान, और मैं सोच रहा हूँ जेब।"

“वह क्या?" मैंने अवाक् होकर अविनाश बाबू की ओर देखा। उन्होंने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक जमा हुआ ढेला-सा निकालकर मेरे हाथ में दिया। उसे रोशनी में अच्छी तरह से जो देखा, तो मेरी आँखें कपाल पर चढ़ गईं।

उस ढेले में अरबी हरूफों की मुहर लगी हुई मुगल जमाने की कोई दस अशर्फियाँ थीं, सोने की!

Professor Shanku Aur Cochabamba Ki Gufa : Satyajit Ray (Bangla Story)

 


प्रोफेसर शंकू और कोचाबम्बा की गुफा : सत्यजित राय (बांग्ला कहानी)

7 अगस्त

आज मेरे पुराने मित्र, होनोलूलू के प्रोफेसर डम्बार्टन की चिट्ठी आई है। उन्होंने लिखा है :

प्रिय शैंक्स,


लिफाफे पर चिपके डाक-टिकट से ही समझ जाओगे कि यह खत बोलिविया से लिख रहा हूँ। प्राकृतिक दुर्घटना से भी सभ्य समाज का उपकार हो सकता है, उसका एक गजब का प्रमाण मुझे यहाँ आकर मिला है। यह चिट्ठी तुम्हें वही बताने के लिए है।


पिछले जून में बोलिविया में जो भूकम्प आया था, उसकी खबर तुम्हारे गिरिडिह तक भी जरूर पहुँची होगी। उस भूकम्प से यहाँ के दूसरे सबसे बड़े शहर कोचाबम्बा से लगभग एक सौ मील की दूरी पर एक विशाल पहाड का एक हिस्सा फटकर दो हिस्सों में बँट जाने से लोगों के जाने-आने का एक रास्ता बन गया है। इस पहाड़ के पीछे की ओर इससे पहले कभी किसी आदमी का पाँव नहीं पड़ा (बोलिविया का अधिकांश हिस्सा ही अभी भूतात्विकों का अजाना है, यह तुम्हें मालूम है)। खैर! इस पहाड़ के आसपास के एक गाँव के कुछ लड़के लुकाछिपी खेलते हुए इस रास्ते से काफी दूर निकल गए। उनमें से एक लड़का छिपने के लिए पहाड़ की एक गुफा में घुसा। घुसते ही उसने अन्दर ही दीवारों पर रंगीन तसवीरें आँकी हुई देखीं।


पिछले शनिवार को पेरु की एक कान्फ्रेन्स के लिए जाते हुए मैं भूकम्प से हुए नतीजे को अपनी आँखों देख जाने की नीयत से बोलिविया आया। आने के दूसरे ही दिन वहीं के भूतात्विक प्रोफेसर कार्डोवा से मैंने उस गुफा के बारे में सुना और उसी दिन जाकर तसवीरों को देख आया। मेरा ख्याल है, तुम्हें भी एक बार यहाँ आना चाहिए। तसवीरें देखने लायक हैं। कार्डोवा से मेरा मतभेद हो रहा है। तुम्हारा समर्थन पाने से (जो कि जरूर ही पाऊँगा!) मुझे कुछ बल मिलेगा। चले लाओ। पेरु में मैंने कह दिया है तुम्हारे नाम से कान्फ्रेन्स का आमन्त्रण जा रहा है। तुम्हारे जाने-आने का खर्च वही लोग देंगे। आशा है, सानन्द हो। बस!


-ह्यूगो डम्बार्टन


मुझे दो कारण से जाने का लोभ हो रहा है। पहला तो कि दक्षिण अमरीका का यह इलाका मेरा देखा हुआ नहीं है। दूसरा कि स्पेन की मशहूर अलतामिरा गुफा की तसवीरें देखने के बाद से ही मेरे मन में आदिम मनुष्य के बारे में तरह-तरह के प्रश्न जग गए हैं। पचास हजार साल पहले के आदमी-जिनसे बन्दरों का बड़ा मामूली-सा ही फर्क है उनके हाथों से ऐसी तसवीरें आँकी कैसे गईं, यह मेरी समझ में अभी तक नहीं आया। एक-एक तसवीर को देखकर तो ऐसा लगता है कि आज के कलाकार भी नहीं आँक सकते, गोकि ये लोग तो सीधे होकर चल भी नहीं सकते थे!


अगर बोलिविया जाना ही पड़े, तो अपनी नई बनाई हुई ‘ऐनिस्थियम' पिस्तौल को साथ लेता जाऊँगा। क्योंकि जिस जगह पर इससे पहले इंसान के कदम ही नहीं पड़े, वहाँ बहुत तरह की अनजानी विपत्तियाँ छिपी रह सकती हैं। ऐनिस्थियम पिस्तौल के घोड़े को दबाने से उसमें तीर की भाँति तरल गैस छूटती है, जो कई घंटे के लिए दुश्मन को बेहोश कर दे सकती है।

अब सिर्फ पेरु के आमन्त्रण की प्रतीक्षा है।


18 अगस्त

बोलिविया के कोचाबम्बा शहर से एक सौ तीस मील दूर भूकम्प से निकली हुई गुफा के बाहर बैठकर अपनी डायरी लिख रहा हूँ। दसेक हाथ की दूरी पर नीचे प्रायः समतल पत्थर के ऊपर चित्त लेटा है डम्बार्टन। उसके दोनों हाथ माथे के नीचे पड़े थे और उसने सफेद कपड़े की टोपी सूरज के ताप से बचने के लिए मुँह पर डाली हुई थी।


दिन के चार बजे का समय। दिन की रोशनी फीकी हो आई है। और बीसेक मिनट में सूरज पहाड़ के पीछे उतर जाएगा। एक अस्वाभाविक आदिम सन्नाटा इस जगह को घेरे हुए है। इससे पहले यहाँ आदमी के पाँव नहीं पड़े, यह यहाँ अजीब ढंग से महसूस होता है। मनुष्य से मेरा मतलब सभ्य मनुष्य है, यह कहना नहीं होगा। क्योंकि आदिम मनुष्य कभी यहाँ थे, इसका सबूत तो पास की गुफा में ही है। बोलिविया के भूकम्प की बदौलत धीरे-धीरे दुनिया के लोग इस अनोखी गुफा के बारे में जानेंगे। अलतामिरा की गुफा को मैंने स्वयं देखा है। फ्रांस की लास्वो गुफा की तसवीर किताब में देखी है लेकिन बोलिविया की इस गुफा से उन दोनों की तुलना ही नहीं हो सकती।


पहली बात तो यह कि तसवीरें तादाद में बहुत ज्यादा हैं। गुफा के अन्दर दाखिल होइए, एक फर्श के सिवाय तमाम तसवीर ही तसवीर है। गुफा के प्रवेशद्वार से लगभग सौ गज तक तसवीर हैं। उसके बाद से गुफा एकाएक पतली हो गई है। घुड़ककर आगे बढ़ना पड़ता है। उस तरह से काफी आगे तक जाने के बाद भी हमें तसवीर देखने को नहीं मिली। लगता है, उन्हीं सौ गज के रकबे में तसवीरें हैं। लेकिन चूंकि गुफा चौड़ी है, इसलिए उस एक सौ गज के अन्दर तसवीरों की संख्या अलतामिरा से दस गुनी होगी।


उन तसवीरों में चित्रण के गुण के अलावा भी अवाक् कर देनेवाली बहत-सी बातें हैं। आदिम मनष्य गहा-प्राचीरों में प्रायः शिकार सम्बन्धी तसवीरें ही आँकते हैं। उनमें जो भी जीव-जन्त का चित्र वे बनाते थे. सब उनके शिकार से सम्बन्ध रखनेवाले ही होते थे। इसके सिवाय ऐसी भी तसवीरें मिलती हैं कि आदमी भाले से शिकार कर रहा है। शिकार के चित्र यहाँ भी हैं, पर ऐसे भी चित्र हैं, जिनका शिकार से कोई वास्ता ही नहीं। पसलन, पेड़-पौधे, फूल, चिड़िया, चाँद आदि। समझ में आ ही जाता है कि ये चीजें अच्छी लगी हैं, इसलिए आँकी गई हैं और कोई कारण नहीं है। तसवीरों के बीच-बीच में एक किस्म की गिचपिच लिखावट या नक्शे जैसी चीज नजर आई. जिसका कोई मतलब नहीं निकलता। कुल मिलाकर यह समझ में आता है कि ये लोग कुछ खास किस्म के आदिम मनुष्य थे।


इससे भी आश्चर्य की बात है, इन तसवीरों का रंग। इनके रंगों में वह बहार और चमक है, जो किसी भी प्रागैतिहासिक गुफा के चित्रों में नहीं है। सम्भवतः ये लोग किसी विशेष प्रकार के पक्के रंग का व्यवहार करते थे। संक्षेप में कहें, देखने से यह नहीं लगता कि ये तसवीरें दस-बारह साल से ज्यादा परानी हैं यद्यपि चित्रों के जीव-जन्तु सब फ्रांस या स्पेन जैसे ही प्रागैतिहासिक हैं। आदिम बाइसन, बड़े-बड़े, टेढ़े दाँतवाले बाघ-इन सबकी अनगिनती और अनोखी तसवीरें गुफा में हैं। इनके अलावा एक और ही तरह के जानवर के चित्र हमने देखे, जो हम दोनों को ही बिलकुल नए-से लगे। इसकी गर्दन लम्बी है, नाक पर गैंडे जैसे सींग और तमाम पीठ पर साहिल-जैसे काँटे। मोटी-सी पूँछ भी है, करीब-करीब मगर-जैसी।


मैं दिनभर अपने ‘कैमेरापिड' से गुफा के चित्रों की तसवीर खींचता रहा। यह कैमरा मेरा ही बनाया हुआ है। इससे रंगीन चित्र लिए जाते हैं और लेने के पन्द्रह सेकंड के अन्दर ही प्रिंट होकर निकल आते हैं। होटल में पहँचने पर इन तसवीरों की छानबीन करूँगा।


गुफा से बाहर चारों ओर देखने से साफ समझ में आ जाता है कि इधर आदमी क्यों नहीं आ सके। यहाँ तीन ओर सलेट-पत्थर के पहाड़ खड़े हैं। पहाड़ अजीब तरह का चिकना है, पेड़-पौधे, झाड़ियाँ नहीं के ही बराबर हैं। दूसरी तरफ, यानी उत्तर की ओर घोर घना जंगल है। हम जहाँ पर बैठे हैं, वहाँ से जंगल का फासला आधा मील तो होगा ही। जंगल के पीछे दूर पर ऐंडीज पर्वतमाला दिखाई पड़ती है, जिसकी चोटी बर्फ से ढंकी है। गुफा के आसपास पेड़-पौधे खास कुछ नहीं हैं, पर पत्थर की चट्टानें चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। इन चट्टानों में से कोई-कोई पचास फुट ऊँची है। कीड़े-मकोड़ों की यहाँ कमी नहीं, मगर चिड़िया अभी तक तो नहीं दिखाई पड़ी है। शायद हो कि जंगल के भीतर हों। जरा ही देर पहले चारेक फुट लम्बा एक मारमाडिलो यानी चींटीखोर जानवर डम्बार्टन के बहुत ही नजदीक से होता हुआ पत्थर के एक टीले के पीछे गायब हो गया।

कुल मिलाकर यहाँ का परिवेश एकबारगी आदिम है और इसीलिए गुफा की तसवीरों की ऐसी बहार इतना अवाक् किए देती है।


एक बात कह रखना अच्छा होगा, यहाँ के वैज्ञानिक पोरफिरिओ कार्डोवा हम लोगों के इस गुफा-अभियान को खास अच्छी नजर से नहीं देख रहे हैं। उसका कारण यह हो सकता है कि उनसे हमारा गहरा मतभेद हो रहा है। कार्डोवा ने कहा, “मैं नहीं जानता, आप लोग इस गुफा को प्रागैतिहासिक कैसे कह रहे हैं। मेरा ख्याल है, इसकी उम्र बहुत भी होगी तो हजार साल। पचास हजार वर्ष की पुरानी गुफा के चित्रों का रंग ऐसा चटकदार कैसे होगा?"


कार्डोवा के बोलने का लहजा बड़ा रूखा है, बहुत कुछ उनके चेहरे जैसा। मैंने इतनी घनी भौंहें किसी की नहीं देखीं।

मैंने कहा, “दीवारों पर जिन प्रागैतिहासिक जानवरों के चित्र हैं वे कैसे आए?"


कार्डोवा ने हँसकर कहा, “आदमी की कल्पना से आज भी हाथी के बदन पर रोएँ उग सकते हैं। उससे कुछ साबित नहीं होता। हमारे देश की इन्को सभ्यता के बारे में सुना है न? इन्को लोगों के बनाए चित्रों के जानवरों से किन्हीं जानवरों का हूबहू मेल नहीं है तो क्या उन जानवरों को प्रागैतिहासिक कहना होगा? इनकी सभ्यता की आयु हजार साल से ज्यादा नहीं है कतई।"

मैंने कुछ नहीं कहा, पर डम्बार्टन ने इसका जवाब देने में चूक नहीं की।


वह बोला, “प्रोफेसर कार्डोवा, अलतामिरा गुफा जब पहले-पहल निकली, तो उस समय भी बहुत-से वैज्ञानिकों ने उसे प्रागैतिहासिक नहीं मानना चाहा था। बाद में लेकिन उन सबको बड़ा अप्रतिम होना पड़ा था!"


इसके जवाब में कार्डोवा ने कछ नहीं कहा। लेकिन हमारे इस अभियान से वह बिलकल ही सन्तुष्ट नहीं है, यह बात भाँप लेने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

जो भी हो, हम कार्डोवा की परवाह किए बिना ही अपना काम करते जाएँगे। आज का काम अब यहीं खत्म। अब शहर को लौटना चाहिए।


18 अगस्त, रात के बारह बजे

गुफा से रात के साढ़े नौ बजे शहर लौटा। रात का भोजन करने के बाद दो घंटे तक अपनी आज की ली हुई तसवीरों को ध्यान से देखा। प्राकृतिक चीजों की तसवीरों से भी जिनके बारे में ज्यादा कौतूहल हो रहा है, वह है वह गिचपिच लिखावट। उन बहुत-सी गिचपिच तसवीरों को पास-पास रखकर उनमें बहुत कुछ समानता देखी। यहाँ तक कि मन में यह सन्देह भी जगने लगा कि असल में ये सब अक्षर या अंक हैं। यदि वही हो, फिर तो इन लोगों को शिक्षित असभ्य कहना होगा! अवश्य यह एक अंदाज-भर है। असल में शायद यह सब उन आदिम लोगों के कुसंस्कार के कोई सांकेतिक चिह्न हों।

इस पर कल डम्बार्टन से चर्चा करना जरूरी है।


19 अगस्त, रात के ग्यारह बजे

होटल के कमरे में बैठा डायरी लिख रहा हूँ। आज शायद इन लोगों का कोई पर्व-त्योहार है, क्योंकि कहीं से जाने गाने-बजाने और चहल-पहल की आवाज आ रही है। एक बहुत भयंकर भूकम्प के बाद कुछ दिनों तक बीच-बीच में हलके धक्के की बात कुछ अस्वाभाविक नहीं है।


आज की रोमांचक घटना के बाद काफी थकावट महसूस कर रहा हूँ। फिर भी इसी समय उसे लिख लेना अच्छा है। यह कह दूं कि रहस्य दस गुना बढ़ गया है। उसके साथ ही एक आतंक का लक्षण दिखाई पड़ा है, जिसने डम्बार्टन जैसे जरनैल अमेरिकी को भी सोच में डाल दिया है।


पहले ही कह चुका हूँ, गुफा कोचाबंबा से कोई एक सौ तीस मील दूर है। रास्ता ठीक होता तो यह दूरी तीन घंटे में तय की जा सकती थी। लेकिन भूकम्प के चलते रास्ता बहुतेरी जगहों पर बड़ी ही बुरी हालत में है, लिहाजा जीप से चार घंटे से कम समय में नहीं जाया जा सकता। दरार पडी जगह पर जीप से उतरकर बाकी रास्ता दस मिनट का। पत्थरों को पार करते हए पैदल जाना पड़ता है।

इसलिए हम लोगों ने तय किया था कि सुबह छह ही बजे हम अपने अभियान पर निकल पड़ेंगे।


होटल से जब जीप रवाना हई, उस समय ठीक सवा छह बज रहे थे। सूरज उस समय तक भी पहाड़ के पीछे ही था। आज हम लोगों ने अपने साथ एक स्थानीय स्पेनिश आदमी को ले लिया था-नाम था पेद्रो। लेने का मतलब था, जब हम गुफा के अन्दर जाएँगे वह बाहर पहरा देता रहेगा। क्योंकि कुछ सरो-सामान, खाने-पीने की चीजें बाहर रखने से हम लोगों के लिए चलना-फिरना और आसान होगा। हम लोगों ने कुछ कहा नहीं था, फिर भी देखा, पेद्रो अपने साथ एक बन्दूक ले आया है। यह किसलिए? पूछने पर उसने बताया, "सिनिओर, यहाँ के जंगलों से कब क्या निकल पड़े, नहीं कहा जा सकता। सो अपने बचाव के लिए मैं इसे साथ लिये चल रहा हूँ।"


गाड़ी जब तीस मील के करीब निकल गई तो अचानक लगा, हमारे पीछे-पीछे एक गाड़ी और आ रही है। और वह मानो हमारी गाड़ी को पकड़ने के ख्याल से खासी तेजी से ही आ रही है। पाँचेक मिनट में ही वह गाड़ी (वह भी जीप ही थी) हमारे पास आ पहुँची। देखा, गाड़ी के अन्दर से हाथ बढ़ाकर प्रोफेसर कार्डोवा हमें रुकने को कह रहे हैं।

लाचार हम रुके। दोनों ही गाड़ी से उतरे। दूसरी जीप से उतरकर कार्डोवा हमारी तरफ बढ़ा। उसमें हमने उत्तेजना की एक साफ झलक देखी।


हमें गम्भीरता से नमस्कार करके कार्डोवा ने कहा, “मेरा ड्राइवर आपके ड्राइवर को जानता है। उसी से पता चला, आप लोग अहले सुबह ही रवाना हो जाएँगे। मैं आप लोगों को सावधान करने के लिए आया हूँ।"


हम दोनों ही अवाक रह गए। कहा, "किस बात के लिए सावधान?"

कार्डोवा ने कहा, "गुफा के उत्तर का जंगल खतरे से खाली नहीं है।"

डम्बार्टन ने कहा, “आपने कैसे जाना?"


कार्डोवा ने कहा, "मैं पहली बार जिस दिन गुफा को देखने के लिए आया था, उस दिन उस जंगल में भी गया था। मुझे यह ख्याल हुआ था कि तसवीरें बहुत कम ही दिन पहले की आँकी हुई हैं। और, इन चित्रों के रंगों के उपादान शायद जंगल में ही पाए जाएँगे। हो सकता है किसी पेड़ के रस या किसी प्रकार के पत्थर को पानी में घिसकर ये रंग तैयार किए गए हैं।"


"उसका कोई पता चला था क्या?"

“नहीं। क्योंकि ज्यादा दूर तक अन्दर घुसने की हिम्मत नहीं पड़ी। जंगल की माटी पर पैरों के कुछ निशान देखकर डर से निकल आया था।"

“किस किस्म के पैरों की छाप?"

“विशाल जानवरों के। किसी जाने हुए जानवर के पैरों की छाप वैसी नहीं होती।"


डम्बार्टन ने हँसकर कहा, “ठीक है। हमें होशियार कर देने की कृपा के लिए धन्यवाद । लेकिन हमारे साथ हथियारबन्द आदमी हैं और गुफा में हमें जाना ही है। ऐसा मौका हम अपने हाथ से जाने नहीं दे सकते। क्या ख्याल है, शैंक्स?”


मैंने सिर हिलाकर डम्बार्टन की बात पर हामी भरी। कहा, “मामूली हथियार के सिवा भी हमारे पास दूसरे हथियार हैं। वे एक जीते-जागते मैमथ को भी कुछ सेकंड में ही पस्त कर सकते हैं।"


कार्डोवा ने कहा, "ठीक है। अपना फर्ज मैंने अदा कर दिया, क्योंकि यह मुल्क मेरा है। आप लोग यहाँ अतिथि हैं। आप लोगों पर कोई मुसीबत पड़ने पर मुझ पर उसकी कुछ जिम्मेदारी तो आ सकती है न! लेकिन जब आप लोग निहायत ही मेरी मनाही मानने को तैयार नहीं हैं; तो मैं क्या कर सकता हूँ? तो मैं चलता हूँ, आप लोग जाइए।"


कार्डोवा अपनी जीप पर सवार होकर शहर की ओर लौट गया। हम लोग गुफा की तरफ चल पड़े।

कुछ दूर जाने पर सामने की सीट से कार्डोवा के बारे में हठात् पेद्रो बोल उठा, “भूकम्प के दिन इन प्रोफेसर साहब का क्या हुआ था, सुना है आपने?'

कहा, "नहीं तो! क्या हुआ था?"


पेद्रो ने कहा, “उस दिन इतवार था। प्रोफेसर सबेरे उठकर गिरजा जा रहे थे। गिरजा के फाटक से अन्दर घुसते समय भूकम्प शुरू हुआ। प्रोफेसर की नजरों के सामने ही मारिया का विशाल गिरजा धूल में मिल गया और लगभग तीन सौ आदमी पत्थर से दबकर मर गए और दस सेकंड की भी देर हुई होती तो प्रोफेसर की भी वही हालत होती।"

हमने कहा, “सो तो उसकी खुशकिस्मती कहनी होगी।”


पेद्रो ने कहा, "वह तो ठीक है। लेकिन उस घटना के बाद से प्रोफेसर का दिमाग बीच-बीच में बिगड़ जाता है। आज वह जिस जानवर के बारे में कह रहे थे, लगता है, वह मनगढंत है। उस जंगल में जो जन्तु हैं, वे बोलिविया के सभी जंगलों में हैं।"


मैंने और डम्बार्टन ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों के मन में एक ही ख्याल कि कार्डोवा नहीं चाहता कि हम लोग गुफा में जाकर अपना काम करें। यानी बहुत सम्भव है, वह यह चाहता है कि गुफा में अगर कोई आश्चर्यजनक तत्त्व का आविष्कार करना है, तो वह आविष्कार वही करे। हम बाहर के आदमी आकर उनके अपने इलाके में अनाधिकार वैज्ञानिक जगत की वाहवाही न लूट लें। मैं जानता हूँ कि वैज्ञानिकों की यह आपसी होड़ अस्वाभाविक नहीं है। फिर भी मैं कहूँगा, इतनी दूर बोलिविया में आकर मुझे इस झमेले में पड़ना पड़ेगा, यह उम्मीद नहीं की थी।


पेद्रो को बाहर मुस्तैद करके हम गुफा में दाखिल हुए। उस समय लगभग साढ़े दस बज रहे थे। आज सूरज कुछ फीका था, क्योंकि आसमान हलकी बदली से ढंका था। कल गुफा के भीतर काफी दूर तक बाहर से आती हुई सूरज की रोशनी से ही साफ दिखाई दे रहा था। आज पचास डग बढ़ते न बढ़ते हाथ की टॉर्च का सहारा लेना पड़ा।


रास्ता जहाँ से पतला हो गया है, वहाँ से बदस्तूर घुड़ककर चलना शुरू किया। आज कुछ और आगे जाने का इरादा है। यहाँ पर तसवीरें नहीं हैं, इसलिए आसपास में देखने का भी कुछ नहीं है। हम लोग जमीन की ओर नजर गड़ाकर बढ़ने लगे। पत्थर गजब के चिकने और अलगी पत्थर नहीं के ही बराबर हैं। साफ समझ में आता है कि यहाँ आदिम लोग काफी अरसे तक रहे हैं, उन्हीं के चलते-फिरते रहने से पत्थर में यह चिकनापन है।


कल जहाँ तक आया था, उससे सौ हाथ आगे बढ़कर देखा सुरंग फिर चौड़ी होने लगी है। लेकिन अभी तक कोई चित्र नहीं नजर आया। डम्बार्टन ने कहा, “सुनते हो, शैंक्स, कभी-कभी मुझे लगता है, अब और आगे बढ़ने से कोई फायदा नहीं है। लेकिन गुफा में यह जो गजब का साफ-सुथरापन दिखाई दे रहा है, उसी से शक होता है कि आगे और भी देखने की चीज है।"


डम्बार्टन ने गोया मेरे मन की बात कही। सचमुच, गुफा के अन्दर कितना झकमक-सा है! दीवार की तरफ ताकने से लगता है जैसे उसे डस्टर से नियमित पोंछा जाता रहा हो।


सुरंग चौड़ी हो गई, इसलिए हम सीधे होकर चल रहे थे। इतने में मेरे कानों में एक आवाज-सी आई। डम्बार्टन के कन्धे पर हाथ रखकर उसे रुकने के लिए कहा।

“सुन रहे हो?"


खुट् खुट् खुट् खुट...मुझे साफ सुनाई दे रहा था। लेकिन डम्बार्टन की सुनने की शक्ति शायद मेरी तरह पैनी नहीं है। वह कुछ और आगे बढ़ गया। उसके बाद रुककर फुसफुसाते हुए कहा, “मिल गई।"


दोनों ने अगल-बगल खड़े होकर कुछ देर तक उस आवाज को सुना। बीच-बीच में रुक जाती, पर ज्यादा देर के लिए नहीं।

आदमी है? या और कुछ ? कहा, “आगे चलो।"

डम्बार्टन ने कहा, "तुम्हारी पिस्तौल साथ में है न?"

"वह काम तो करती है?"


मैंने हँसकर कहा, “उसकी परीक्षा तो नहीं कर सकता, किन्तु इतना कह सकता हूँ, मेरी बनाई कोई चीज आज तक फेल नहीं हुई।"

"तो फिर चलो।" कुछ दूर जाकर एक मोड़ घूमते ही हम दोनों ठिठक गए।


हम एक खासे हॉल में जा पहुंचे थे। इधर-उधर टॉर्च की रोशनी डाली। देखा, वह एक गोल कमरा है, जिसकी परिधि कम-से-कम सौ फुट की तो होगी। ऊँचाई कम-से-कम बीस फुट।


हॉल की दीवारें और छत चित्र और नकशे से गिजबिज कर रही थीं। चित्र से नकशा ही ज्यादा। उन्हें देखकर समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि ये अंक या फार्मूला किस्म के कुछ हैं।


डम्बार्टन ने दबे गले से कहा, “कला की दुनिया से हम धीरे-धीरे विज्ञान का दुनिया में आ पहुँचे, ऐसा लगता है! यह सब किनकी करामात है? इनका मतलब क्या है? ये नकशे कब के हैं?"

खुट्-खुट् की आवाज थम गई थी।


मैंने हाथ की टॉर्च को रखकर कन्धे के थैले से कैमरे को निकाला। फ्लैश-लाईट है-फिक्र की बात नहीं। मैंने खूब महसूस किया कि उत्तेजना से मेरे हाथ काँप रहे हैं।

कैमरा निकालकर दो ही चित्र लिये थे कि एक धीमी, लेकिन तीखी चीख हमारे कानों में आई।

आवाज अवश्य यह गुफा के बाहर से आ रही थी। पेद्रो की चीख।


पल-भर की देर न करके हम दोनों पीछे की ओर लौट पड़े। चलकर, दौड़कर, घुड़ककर हमें बाहर निकलने में बीस मिनट के करीब लग गए। निकलकर देखा, पेद्रो अपनी जगह पर नहीं है, गरचे हमारे सामान ज्यों के त्यों हैं। आखिर यह आदमी गया कहाँ? दाएँ पत्थर का एक टीला था। डम्बार्टन दौड़कर उसके पीछे गया और चीख पड़ा, “इधर आइए, शैंक्स!"


जाकर देखा, आँखें कपाल पर चढ़ाए पेद्रो चित्त पड़ा है। उसके गले के एक गहरे जख्म से लहू बह रहा है। उसकी बन्दूक उससे पाँच हाथ दूर पर पड़ी है। पेद्रो की निष्पलक आँखों के आतंक का वह भाव मैं कभी नहीं भूलूँगा। उसकी नब्ज देखकर डम्बार्टन ने कहा, "अरे! यह तो मर गया!" यह कहने की भी जरूरत नहीं थी। देखते ही समझ में आ रहा था कि पेद्रो के शरीर में जान नहीं है।


अब हमारी नजर पेद्रो से भी लगभग बीस हाथ उत्तर की ओर गई। मिट्टी पर कुछ जगह लिये एक लाल निशान और था। आगे बढ़कर समझा, वह भी शायद लहू है। लेकिन वह लहू आदमी का नहीं है। लहू के आसपास जो चीज पड़ी थी, उसे देखने से मूठरहित तलवार-सी लगती थी। हाथ में उठाकर उसे परखा, वह किसी धातु की बनी चीज नहीं थी।


मैंने उसे डम्बार्टन के हाथ में दे दिया। उलट-पुलट करके देखकर वह बोला, “इससे मुझे जो अंदाजा हो रहा है, वह अगर सही हो, तो अब हमारा यहाँ रहना ठीक नहीं है।"


मैंने समझा, हम दोनों ही का अंदाज एक ही है, फिर भी वह सच है, यह यकीन नहीं कर पा रहा था। मैंने कहा, "दीवार पर आँके उस अनामे जानवर की सोच रहे हो क्या?"

"बेशक! पेद्रो ने घायल होने के बाद भी गोली चलाई थी। उससे वह जानवर जख्मी हुआ और उसकी पीठ से यह काँटा टूट गिरा।"


डमबार्टन की उम्र पचास होते हुए भी वह खासा जवान है। उसने अकेले ही पेद्रो की लाश को कन्धे पर उठा लिया। मैंने बाकी सारे सामान उठाए। आसमान में बादल घिरे होने से एक थमथम करता हुआ-सा भाव! तो, कार्डोवा ने गलत नहीं कहा। उत्तर के इस जंगल में और भी न जाने कितनी विभीषिका छिपी हुई है।


पेद्रो की लाश उसके घर पहुँचाकर, उसके बाप को दिलासा और कुछ रुपए-पैसे देकर जब होटल को लौट रहा था, तो टिपटिप-टिपटिप बारिश शुरू हो गई थी। घड़ी में सात बजे थे।

होटल में घुसते ही देखा, सामने ही एक सोफे पर प्रोफेसर कार्डोवा बैठे हैं। हमें देखते ही भले आदमी हड़बड़ाकर आगे बढ़ आए।

“खैर, तुम लोग लौट आए!" डम्बार्टन ने कहा, “लौट तो आए, लेकिन सभी नहीं।" “मतलब?" कार्डोवा को घटना बताई।


सब सुन-सुनाकर कार्डोवा के आँख-मुँह में एक अजीब भाव जग आया, जिसमें अफसोस के बजाय उल्लास की मात्रा ज्यादा थी। दबी उत्तेजना से वह बोला, “मेरी बात का आप लोगों ने यकीन नहीं किया। लेकिन अब समझ गए न? मैं जानता हूँ कि उस जंगल में ऐसे-ऐसे अजीब जीव हैं, जो दुनिया में और कहीं नहीं हैं और मैं जानता हूँ, गुफा के चित्रों के बारे में तुम लोगों की धारणा गलत है। वहाँ इन्को जातीय कोई सभ्य लोग रहते थे, वह भी ज्यादा दिन पहले नहीं। चित्रों के जन्तुओं को देखकर ही तो आप लोगों ने गुफा की आयु का अंदाज किया था! लेकन अब समझ ही सकते हैं कि उनमें से कम-से-कम एक प्रकार के जानवर अभी भी हैं। लुप्त नहीं हुए हैं। लिहाजा मेरा अंदाज ठीक है। मैंने आप लोगों के भले के लिए ही कहा है, उस गुफा के पीछे आप नाहक ही समय न बरबाद करें।"

बोलकर कार्डोवा हनहनाता हुआ होटल से चला गया।


डम्बार्टन ने कहा, “डर लग रहा है, वह अकेले ही शाबाशी लूटने के लिए झट किसी अखबार में कुछ निकलवा न दे। अभी भी साफ तौर पर कुछ जाना नहीं जा सका है, मगर वह हम लोगों से होड़ लेने के लिए व्यग्र हो उठा है।"


मैंने कहा, “फिर भी तो उसे पता नहीं है कि गुफा में हम लोगों ने खुट्-खुट् की आवाज सुनी है। तब तो वह कह ही बैठता कि गुफा में अभी भी लोग रह रहे हैं-चित्र पचास हजार नहीं, पाँच वर्ष के आँके हुए हैं!"


हम लोग बाकायदा थके हुए लग रहे थे, इसलिए और समय नष्ट न करके अपने-अपने कमरे में चले गए। बारिश जोर से ही होने लगी, उसके साथ बीच-बीच में मेघों की गरज और बिजली की चमक। गरम पानी से नहाकर लगातार दो प्याला कॉफ़ी (यहाँ की कॉफ़ी बड़ी अच्छी है) पीने के बाद धीरे-धीरे शरीर और मन का बल लौट आया। डिनर भी कमरे में ही मँगवाकर खाया। उसके बाद अपनी खींची हुई तसवीरें लेकर बैठा। उन गिचपिच नकशों के रहस्य का पता लगाना था। अनचीन्हे अक्षरों का मतलब निकालने में मेरा सानी नहीं। हरप्पा और मोहेंजोदड़ों की लिपि का मतलब दुनिया में मैंने ही पहले निकाला।


डेढ़ घंटे तक उन गिचपिच चित्रों को आपस में मिलाकर एक चीज ढूँढ़ निकाली, जिसे फोन करके डम्बार्टन को फौरन बताया। ये चिह्न सारे के सारे वैज्ञानिक फार्मूले हैं और इनसे हमारे आज के फार्मूलों की समानता है।


डम्बार्टन पाँच ही मिनट में मेरे कमरे में आया और मेरी बात सुनकर धप्प से खाट पर बैठकर बोला, "दिस इज़ टू मच! सब गड़बड़ हुआ जा रहा है, शैंक्स! ये फार्मूले पचास हजार साल पहले के वनमानुसों ने निकाले हैं, यह हरगिज विश्वास नहीं कर पाता।"

मैंने कहा, “तो?"

"तो क्या! तो इतिहास को फिर नए सिरे से लिखना होगा! आदिम मनुष्यों के बारे में आज तक जो कुछ भी जाना गया है, उसकी किसी भी बात का मेल इन अंकों के साथ नहीं बैठाया जा सकता।"


पेद्रो की लाश के पास जो चीज मिली थी, उसे मैं अपने कमरे में ले आया था। डम्बार्टन ने अन्यमनस्क-सा होकर उसे अपने हाथ में उठा लिया था। हठात् उसे अपनी नाक के पास ले जाकर वह उसे सूंघने लगा।

“शैंक्स!" डम्बार्टन की आँखें झकमका रही थीं। "सूँघकर देखो।"

मैंने उस काँटे को हाथ में लेकर सूंघा। एक जानी-पहचानी-सी बू मिली। मैंने कहा, “प्लास्टिक।"

“ठीक! कोई शुबहा नहीं। बड़ी चतुराई की कारीगरी है लेकिन यह आदमी के ही हाथ का बनाया हुआ है। इससे किसी जानवर का कोई वास्ता नहीं।"

"लेकिन इसका मतलब क्या?"


सवाल पूछे जाते ही उसके बहुत-से जवाब एक साथ ही मेरे मन में खेल गए। कहा, "मामला कठिन है। पहली बात तो यह कि पेट्रो किसी जानवर के डर से नहीं मरा। उसका किसी आदमी ने खून किया है। इसका एक ही मतलब हो सकता है कि जिसने मारा है, वह नहीं चाहता है कि हम गुफा के पास जाएँ और यह आततायी कौन है, सो साफ ही समझ में आ रहा है।"

"हूँ !"

डम्बार्टन खाट पर से उठकर इधर-उधर घूमने लगा। उसके बाद बोला,

"लगता है, हमें यहाँ टिकने नहीं देगा।"

"लेकिन इस तरह से हार मान लेंगे?" मेरे वैज्ञानिक मन में विद्रोह का भाव जाग उठा था।

डम्बार्टन ने कहा, “एक काम किया जाए।"

"क्या?"


“कार्डोवा से कहें, इसकी शाबाशी लेने का लोभ हमें नहीं है। असली जो जरूरत है, वह यह कि इस अजीब गुफा के तथ्य दुनिया के लोगों को सही-सही बताना। लिहाजा कार्डोवा हमारे साथ हो जाएँ। हम मिलकर ही अभियान करें। उसका अनुमान यदि गलत हो, तो भी उसका नाम हम लोगों के साथ जुड़ा रहेगा। लोगों की नजर में हम एक 'टीम' होंगे। क्या ख्याल है?"

"लेकिन एक खूनी को इस तरह से साथ करोगे?"


"खून का प्रमाण तो नहीं है। और ऐसा नहीं करने से वह हमारे काम में तरह-तरह की अड़चनें डालेगा। हमारा काम बन जाए, फिर इसकी पोल खोल देंगे। अभी कुछ नहीं कहेंगे। यहाँ तक कि यह भी नहीं कि हम लोगों ने जान लिया है, वह काँटा प्लास्टिक का है।"

“खैर, वही सही।"


फोन करने पर कार्डोवा नहीं मिला। उसके घरवालों को भी पता नहीं था कि वह कहाँ गया है। सोच लिया। कल सवेरे उससे बातचीत का सिलसिला बैठाया जाएगा। हम लोगों का यह काम जिसमें बेकार न हो, इसके लिए जो भी जरूरी है, करना ही है।


डर आसमान की हालत देखकर लग रहा था। कल भी अगर ऐसी ही हालत रही, तो निकलना नहीं हो सकेगा। लेकिन तसवीर लगभग ढाई-सौ हैं, उन्हीं को देखकर दिन काट लिया जाएगा।


20 अगस्त

जिस बात का डर था, वही हुई। आज तमाम दिन होटल के कमरे में ही बैठकर बिताना पड़ा। रात के साढ़े दस बज रहे हैं। अब बारिश कुछ रुकी है।


लेकिन घर बैठे भी घटना का अभाव नहीं रहा। पहली तो यह कि आज भी दिन-भर कार्डोवा का पता नहीं चला। सुबह से लेकर शाम तक बहुत बार टेलीफोन किया गया। देखा, उसके घर के लोग खासे चिन्तित हैं। घरवालों को आशंका है, पागलपन के चलते भूकम्प से पड़ी दरारों में से किसी में शायद गिर पड़ा हो।


इधर डम्बार्टन के दिमाग में और भी एक अजीब ख्याल हो आया। दोपहर को वह दौड़ता हुआ मेरे कमरे में आया। बोला, “चौपट!" मैंने पूछा, “क्या हो गया?"


डम्बार्टन सोफे पर बैठकर बोला, "तुम्हारे दिमाग में यह बात आई है क्या कि दीवारों के वे सारे सांकेतिक फार्मूले कार्डोवा के लिखे हैं? मान लो, तसवीरों के आसपास वह सब गिचपिच लिखकर वह साबित करना चाहता हो कि गुफावासी लोग विज्ञान में काफी दूर तक आगे बढ़े हुए थे? यदि वह ऐसी एक बात साबित कर सके तो उसकी कैसी प्रसिद्धि होगी, समझ रहे हो?"

"अलबत्ता सोचा है!"


वास्तव में डम्बार्टन की सूझ की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। डम्बार्टन कहता गया, “ज़रा उस आदमी के खुराफाती दिमाग की सोचो तो सही। मेरे यहाँ आकर पहुँचने के कोई दस दिन पहले इस गुफा का पता चला था। गुफा को मनमाना सजाने का काफी वक्त मिला कार्डोवा को। पत्थर के ये सारे औजार उसी ने बनवाए हैं, जैसाकि वह काँटा बनवाया।"


मैंने कहा, “फार्मूलों के पीछे, लगता है, नाहक ही समय बरबाद किया। लेकिन...” मेरे मन में एकाएक एक खटका-सा हुआ, “गुफा के अन्दर खट्-खट् की आवाज कहाँ से आ रही थी?"


"वह कारस्तानी भी कार्डोवा की नहीं है, यह कैसे जाना? उसने ही अगर पेद्रो का खून किया हो, तो वह उस दिन गुफा के आसपास ही होगा। शायद हो कि गुफा के किसी और मुँह को खोज निकाला हो। उसी के अन्दर जाकर वह हमें डराने के लिए आवाज कर रहा था।"

“लेकिन यह सब कर-कराके वह कम-से-कम मुझे पस्त-हिम्मत नहीं कर सकता।"

डम्बार्टन ने कहा, “मुझे भी नहीं। कल अगर बारिश बन्द हो जाए, तो हम लोग फिर चलेंगे।"

"बेशक! उसे मेरी ऐनिस्थियम बन्दूक का तो पता नहीं है न?"


डम्बार्टन के चले जाने के बाद सोचने लगा। कार्डोवा ने यदि सचमुच ही ये सारे कारनामे किए हैं, तो मानना होगा कि उसके जैसा कूटबुद्धि शैतान वैज्ञानिक दूसरा नहीं है।


कल गुफा के और अन्दर जाकर यदि नया कुछ न मिले तो अब यहाँ ठहरना बेकार है। मैं अपने घर लौट जाऊँगा। गिरिडिह में बहुत सारे काम पड़े हैं। अपने बिल्ले न्यूटन के लिए भी मेरा मन कैसा तो कर रहा है!


22 अगस्त

आदमी के मन के भंडार में कितनी कोटि स्मृतियाँ जमी हुई होती हैं, इसका लेखा कभी कोई नहीं लगा सका और वह सब दिमाग में ठीक किस जगह किस तरह से जमा रहती हैं, यह भी कोई नहीं जानता। हम लोग सिर्फ इतना ही जानते हैं कि जैसे बहुत दिनों की पुरानी बात भी कारण-अकारण हठात् कभी हमें याद आ जाती हैं। वैसे ही कोई-कोई घटना सदा के लिए हृदय से पुंछ भी जाती है किन्तु कोई-कोई घटना होती है, जो कभी नहीं भूलती। ज़रा देर चुपचाप बैठे रहने पर ही दस साल के बाद भी वैसी घटनाएँ आँखों में नाच उठती हैं। तिस पर घटना अगर कल जैसी भयानक हो तो उसके याद आते ही सारे शरीर में सिहरन का अनुभव होता है। मैं जो अब तक जिन्दा हूँ यही ताज्जुब है और कौन-सी अदृश्य शक्ति बार-बार मुझे निश्चित मृत्यु के हाथ से बचाती है, यह भी नहीं जानता।


कल डायरी लिखी नहीं जा सकी। सो सबेरे से ही शुरू की। बारिश परसों आधी रात से ही थम गई थी। हमारी जीप ठीक समय पर तैयार थी। मैं और डम्बार्टन तड़के छह बजे होटल से निकले। हमारी जीप के ड्राइवर का नाम था मिगुएल। वह भी स्पेनिश ही था। गाड़ी चल पड़ने के कुछ देर बाद वह बोला, "कार्डोवा का शायद अभी तक भी पता नहीं चला है। सिर्फ इतना ही जाना जा सका है कि वह पैदल नहीं गया है, जीप से निकला है।" हम लोगों ने तो सिर थाम लिया। तो क्या वह फिर गुफा की तरफ ही गया है? कल उस बारिश में ही?


साढ़े-तीन घंटे के पश्चात् हमारे प्रश्न का जवाब मिला। कार्डोवा की जीप पहाड़ की दरार के सामने गुफा के मुँह पर ही खड़ी थी। देखकर ही लग रहा था कि जीप पर से काफी पानी गुजरा। ड्राइवर शायद कार्डोवा के साथ ही गया है, क्योंकि जीप खाली पड़ी थी।


हमने इन्तजार नहीं किया। चल पड़े। मिगुएल ने कहा, “सिनिओर, आप लोग जा रहे हैं, यह मुझे कतई अच्छा नहीं लग रहा है। मैं आप लोगों के साथ जाता, लेकिन उस दिन पेद्रो के सा मन में बड़ा डर समा गया है। मेरे घर में बाल-बच्चे हैं!"


हम दोनों ने कहा, “तुम्हारी कोई जरूरत नहीं। कोई खतरा भी नहीं। यदि कोई आफत आती दीखे तो हम लोगों की राह न देखकर चल देना। लेकिन कोई मुसीबत होगी, ऐसा नहीं लगता और फिर वैसे को सबक देने के लिए वैसा हथियार हमारे पास है।"


गुफा के मुँह पर पहुँचा तो आदमी-आदमजाद का कोई लक्षण नहीं दिखाई दिया और उस दिन की तरह ही सब सुनसान, सन्नाटा पड़ा था। जमीन पथरीली है, जंगल की तरफ ढलान है, इसलिए रात की वर्षा का पानी जमा नहीं था। वर्षा हुई है, ऐसा पता ही नहीं चल रहा था।

कार्डोवा क्या गुफा के अन्दर है कि जंगल में गया है?

डम्बार्टन ने कहा, “बाहर रुके रहने से कोई लाभ है?"


मैंने 'ना' कहकर गुफा की तरफ कुछ कदम बढ़ाए कि गुफा के मुँह के दाईं ओर बाहर के पत्थर की एक दरार से कोई सादी-सी चीज दिखाई पड़ी। मैंने हाथ घुसाकर देखा, मुड़ी हुई एक चिट्ठी थी। कार्डोवा की लिखी। खोलकर दोनों ने उसे एक ही साथ पढ़ा। लिखा था :


प्रिय प्रोफेसर डम्बार्टन और प्रोफेसर शँकू,

मैं जानता हूँ कि आप लोग यहाँ फिर आएँगे। यह चिट्ठी मिलते ही समझिएगा कि मुझ पर कोई आफत आई है, मैं गुफा में ही अटक गया हूँ। लिहाजा आप लोग घुसने से पहले सोच लेना कि काम आप ठीक कर रहे हैं या नहीं। मैं मरा भी तो गुफा के रहस्य को खोलकर ही मरूँगा। लेकिन लोगों तक उस रहस्य की बातें पहुंचा पाऊँगा। आप लोग यदि बच गए, तो यह रहस्य लोगों को बता पाएँगे। मेरा केवल एक अनुरोध है कि आप लोगों के साथ इसमें मेरा भी नाम जुड़ा रहे।


यह शायद समझ ही गए होंगे कि पेद्रो की मौत का जिम्मेदार मैं ही हूँ। वह काँटा मेरी ही प्रयोगशाला का बना हुआ है। लेकिन जंगल में पैरों का निशान मैंने ठीक ही देखा था, उस मामले में बेखबर रहने से आप लोग भारी भूल करेंगे।

जानता हूँ, ईश्वर आप लोगों की रक्षा करेंगे। आप लोग मेरी तरह पापी तो नहीं हैं न।


आपका

पोरिफिरिओ कार्डोवा


इस एक चिट्ठी से हमारे मन का भाव बिलकुल बदल गया और नए सिरे से एक अजानी आशंका जग आई। लेकिन काम बन्द करने से काम नहीं चलेगा। मैंने कहा, “चलो ह्यूगो, अन्दर चलें। नसीब में चाहे जो भी लिखा हो।"


कुछ दूर जाते ही समझ गया कि कार्डोवा यहाँ आए थे, क्योंकि आधी पी हुई एक खाली सिगरेट जमीन पर पड़ी थी। वैसी सिगरेट सिर्फ कार्डोवा को ही पीते देखा था। लेकिन इसके सिवाय आदमी का और कोई चिह्न नजर नहीं आया। पत्थर पर जब पाँव का निशान पड़ता ही नहीं तो और कौन-सी निशानी रहेगी?


उस विराट हॉल में पहुँचकर इस बार वहाँ रुके बिना हम सीधे उलटी तरफ की सुरंग से चलने लगे। थी तो सुरंग ही, पर रास्ता यहाँ चौड़ा था। सिर झुकाकर नहीं चलना पड़ रहा था।


एक आवाज सुनाई दे रही थी। हलकी गरज-सी आवाज। उसे डम्बार्टन ने भी सुना। उस गरज में घट-बढ़ भी देखी। असली आवाज किस जोर की और कितनी दूर से आ रही है, यह समझने का कोई उपाय नहीं था। डम्बार्टन ने कहा, “गुफा के भीतर जन्तु-जानवर तो नहीं हैं न?" वास्तव में आवाज बड़ी अजीब-सी थी। एक बार ऊँची, एक बार धीमी। बहुत-कुछ गुर्राहट-सी।


सुरंग सामने बाएँ को मुड़ गई थी। उस मोड़ से घूमते ही देखा, हम एक दूसरे बड़े-से कमरे में पहुंच गए हैं। इधर-उधर टॉर्च की रोशनी डालकर समझा, यह एक अजीब ही कमरा है। चारों ओर अजीब-अजीब अजाने औजार पड़े हैं और दीवारों पर चित्रों के बदले गणित और ज्यामिति के नक्शे। औजारों में से कोई भी काँच, लोहा, इस्पात या हम लोगों के किसी पहचाने हुए धातु का नहीं बना है और फिर पतले-पतले, लम्बे-लम्बे तार जैसी चीज, जो दीवार पर से होती हुई इधर-उधर को गई थी, वह सब चीज काहे की बनी हुई हैं, समझ में नहीं आया।

फर्श पर कुछ है या नहीं, यह देखने के लिए टॉर्च जलाते ही एक दृश्य देखकर मेरे बदन का रक्त पानी हो गया।


दीवार के पास ही, अपने दाएँ हाथ से एक तार को पकड़े औंधे मुँह पड़े हैं प्रोफेसर कार्डोवा। कार्डोवा की पीठ पर माथा रक्खे चित्त पड़ा था बाएँ, उनका ड्राइवर और ड्राइवर के पास दाएँ हाथ में बन्दूक लिये पड़ा था और भी एक अनजाना आदमी। इन तीनों में से किसी के शरीर में प्राण नहीं थे, यह कहना ही फिजूल है।

मेरे मुँह से अपने आप ही निकल गया-“इलेक्ट्रिक शाक!" फिर कहा, “इन लोगों को छूना मत, डम्बार्टन!"


डम्बार्टन ने धीरे-से कहा, “यह कहने की जरूरत नहीं, फिर भी धन्यवाद। और धन्यवाद कार्डोवा को, क्योंकि उसकी यह दशा नहीं देखता तो शायद हम लोग भी उस तार पर हाथ डाल सकते थे। कार्डोवा को बचाने में ही बाकी दो व्यक्तियों की भी जान गई है। कैसी भयंकर बात है, कहो तो?"

मैंने कहा, “इससे एक बात का सबूत मिलता है कि ये फारमूले कार्डोवा के लिखे हुए नहीं हैं।"


वह जो हलकी-सी गरज हो रही थी, वह अब हलकी नहीं रही। वह हम लोगों के काफी करीब से ही आ रही थी। मैं हाथ में टॉर्च लिये आगे बढ़ा। मेरे पीछे डम्बार्टन। गरज बढ़ रही थी।


उन औजारों से बचते हुए बड़ी सावधानी से कोई एक मिनट चलने के बाद सामने और एक दरवाजा दिखाई दिया। यह भी समझा कि उस दरवाजे के पीछे और भी एक कमरा है। और उस कमरे में रोशनी है। डम्बार्टन से मैंने कहा, “तुम अपनी टॉर्च बुझाओ तो।"


दोनों के हाथ की रोशनी बुझते ही काँपती हुई एक लाल रोशनी से गुफा का भीतरी भाग भर गया। समझा कि अन्दर आग जल रही है और वह गरज भी वहीं से आ रही है। डम्बार्टन की आवाज निकली, "अपनी बन्दूक तैयार रक्खो !"


बन्दूक को सम्हालकर बहुत धीरे-धीरे हम दोनों उस कमरे के अन्दर गए। विशाल कमरा। उसके एक कोने में एक चूल्हे में आग जल रही थी, उसके सामने जन्तुओं की कुछ हड्डियाँ बिखरी पड़ी थीं। कमरे के बीच में पत्थर की एक वेदी या खाट। उस पर एक प्राणी चित्त होकर सोया हुआ था, नींद में।

हम लोग धीरे-धीरे पा-पा करके खाट की तरफ बढे।


उस जीव को आदमी कहना खटकता था। ढालू कपाल, सिर के बाल लगभग भौंहों तक उतर आए थे। होंठ मोटे, ठोढ़ी दबी-सी, कान चिपटे और गरदन नहीं होने के ही बराबर। सारा बदन राख के रंग के रोएँ से भरा और चेहरे पर जहाँ रोआँ नहीं था, वहाँ की चमड़ी गजब तरह की सिकुड़ी हुई। उसका बायाँ हाथ छाती पर और दूसरा खाट पर लम्बा पड़ा था। इतना लम्बा हाथ कि उँगली की नोक घुटने तक पहुंच गई थी।


डम्बार्टन ने अस्फुट स्वर में कहा, “केव-मैन! अभी भी बन्दर की अवस्था से पूरी तरह आदमी की शकल में नहीं पहुंचा है।"

गले की आवाज को भरसक धीमा करके मैंने जवाब दिया, "केव-मैन सिर्फ यह शकल में है, क्योंकि गुफा में जो कुछ भी देख रहा हूँ, सबकुछ इसी की कीर्ति है।"

डम्बार्टन ने अचानक कन्धे पर हाथ रखकर कहा, “शैंक्स, वह क्या लिखा है, पढ़ पा रहे हो?"


डम्बार्टन ने उँगली के इशारे से दीवार की ओर दिखा दिया। बड़े-बड़े हरूफों में क्या तो लिखा था। हरूफों को फारमूलों से ही पहचान लिया था, इसलिए लिखने का मतलब निकालने में समय नहीं लगा। मैंने कहा, “गजब है!"

"क्या?"


लिखा है-“और सभी मर गए। मैं हूँ। मैं रहूँगा। मैं अकेला हूँ। मैं बहुत जानता हूँ और भी जानूँगा। जानने की सीमा नहीं। पत्थर मेरा मित्र है। पत्थर शत्रु!"

डम्बार्टन ने कहा, “तो समझो, यह उन्हीं प्रागैतिहासिक लोगों में से एक है। किसी अनोखे उपाय से अनन्त आयु पा गया है।"

“हूँ! और हजारों साल से ज्ञान संचय करता आ रहा है। केवल चेहरा गुफावासी जैसा रह गया है।...लेकिन अन्तिम दो शब्दों का क्या मतलब समझा?"


“पत्थर इसका मित्र है, यह तो देख ही रहा हूँ। इसके घरद्वार, असबाब पत्तर, औजार आदि पत्थर के बने हैं। लेकिन शत्रु से पता नहीं, क्या मतलब है!"


डम्बार्टन मेरी ही तरह आश्चर्य से अवाक् हो गया था। बोला, “गुफा में रहता है, इसलिए दिन-रात का फर्क सब समय समझ नहीं पाता। शायद हो कि रात में जगता रहता है, इसलिए दिन को सो रहा है।"


चित्र खींचने की हिम्मत नहीं हो रही थी। कैमरे के शब्द से नींद खुल जाए कहीं! हम लोगों जैसे आदमी को एकाएक आँखों के आगे देखकर वह क्या करेगा? लेकिन लोभ सम्हालना भी कठिन हो रहा था। इसलिए डमबार्टन के हाथ में बन्दूक थमाकर कन्धे पर की थैली से कैमरा निकालने की सोचकर हाथ डाला कि नाक बजने की आवाज को छापकर गहरी घड़घड़ाहट सुनने में आई। डमबार्टन ने खप्प से मेरा हाथ पकड़कर कहा, “भूकम्प!" दूसरे ही क्षण एक गहरे धक्के से गुफा का भीतरी भाग थर-थर काँपने लगा। कई पलों तक सोच ही नहीं पाए कि क्या करें! गड़गड़, गुम्गुम् की आवाज बहती गई, उसके साथ-साथ कम्पन भी। "बन्दूक!” डम्बार्टन दबे गले से चिल्ला उठा। आदिम आदमी की नींद टूट गई। वह खाट पर उठ बैठा। मैं डम्बार्टन के हाथ से बन्दूक ले करके भी कुछ कर नहीं सका। सिर्फ तन्मय होकर सामने की तरफ ताकने लगा।


वह तब तक उठ खड़ा हुआ। रोएँदार भौंहों के नीचे गढ़ों में ढंकी आँखों से एकटक हमें देखने लगा। सीधा खड़ा था, इसलिए समझा कि पाँच फुट से ज्यादा लम्बा नहीं है। कन्धा गुरिल्ले जैसा चौड़ा और पीठ शायद उम्र के लिहाज से झुक गई है। उसकी नजरों के भाव से समझा, उसने हम जैसे आदमी को इससे पहले नहीं देखा है।


भूकम्प के बार-बार धक्के लगने से वह जैसे डर गया हो। एक कातर लेकिन कर्कश आवाज हुई। मैंने समझा, गुफा की दीवार में कहीं दरार पड़ी। हम लोगों ने और राह नहीं देखी, एक ही साँस में कमरे से बाहर भागे। दूसरे ही क्षण आदिम आदमी वाले घर की छत धंस गई।


कार्डोवा और उनके साथियों की लाश से कतराकर भागते-भागते डम्बार्टन ने कहा, "उस अन्तिम बात का मतलब समझा न? पत्थर से दब करके ही उसकी मौत हुई।"


धरती का हिलना थम नहीं रहा था। हम कैसे बाहर निकल पाएँगे, नहीं जानता। घुड़ककर चलनेवाला रास्ता तो अभी बाकी ही है। उस बड़े-से हाल के करीब पहुंचा, तो देखा, सामने दिन की रोशनी दिखाई दे रही है। यह कैसे दिखा? रास्ता तो एक ही है! गलत रास्ते से आने की कोई सम्भावना नहीं थी।

आगे बढ़कर देखा, भूकम्प से घर की दीवार में दरार पड़कर निकलने का एक नया रास्ता बन गया है।


पत्थरों के टूटने से कुछ अनोखी तसवीरें और नक्शे सदा के लिए बरबाद हो गए, यह सोचने का समय नहीं था। गुफा के नए रास्ते से हम दोनों दौड़ते हुए पत्थरों को फलाँगते बाहर निकले।


बाहर आने पर कुछ सेकंड के लिए दिशा-भ्रम हुआ था, पर ऐंडीज़ की चोटी पर बर्फ देखकर पता चल गया। हमें बाईं ओर चलना होगा, तभी हम गुफा के असली दरवाजे और अपने निकलने के सही रास्ते पर पहुँच सकेंगे।

बीच में आधे मिनट के लिए भूकम्प का धक्का रुका था, पर फिर से गुम्गुम आवाज के साथ जोरों की झकझोर शुरू हो गई।


लेकिन भूकम्प की आवाज के सिवाय भी कोई आवाज आती-सी लग रही थी। वह आवाज आ रही थी हमारी दाईं ओर के उस भयंकर जंगल से। आवाज से लग रहा था, जैसे एक ही साथ अनगिनती दमामे बज रहे हों और उसी के साथ जैसे असंख्य अजाने जीव आतंक से चीख रहे हों। जंगल की तरफ ताकते हुए मैं खड़ा हो गया था, पर मेरी आस्तीन को खींचकर डम्बार्टन ने कहा, “रुको मत। चलते चलो।"


रास्ता थोड़ा समतल हो आया था, इसलिए हम लोगों ने दौड़ना कुछ तेज कर दिया। लेकिन दाईं ओर से मैं अपनी नजर हटा नहीं पा रहा था क्योंकि वह धपधपाहट और उसके साथ चीख की आवाज बढ़ती ही जा रही थी। करीब आती जा रही थी।


इतने में जानवरों पर नजर पड़ गई। जंगल से वह सब पागल की भाँति दौड़ते चले आ रहे थे। पहली पाँत में मैमथ-विशाल, लोमस हाथी। चीखते हुए हुड़मुड़ करते हुए जंगल से खुली जगह की तरफ-यानी हमारी ही ओर चले आ रहे थे।

उस अजीब और भयावने दृश्य को देखकर हम लोगों के पाँव मानो अब बढ़ना नहीं चाह रहे थे और इधर वे जानवर हम लोगों से तीन-चार सौ गज़ की दूरी पर आ पहुँचे।


डम्बार्टन अचानक सूखे गले से चीखकर बोल उठा, “वह क्या है?"

मैंने भी देखा। मैमथ के ठीक पीछे एक अजीबोगरीब जानवर, लम्बा गला, नाक के ऊपर सींग, पीठ पर काँटों की झाड़ी-सी। गुफा की दीवार पर जो देखा था, वह जानवर ! पूँछ पर भार देकर जान के डर से कंगारू की तरह उछलउछलकर भागा जा रहा था।

मेरे तो हाथ-पाँव ठंडे हो आए। मेरे हाथ में ऐनिस्थियम पिस्तौल थी। लेकिन पशुओं की इस उन्मत्त सेना के सामने इस पिस्तौल की बिसात भी क्या!

डम्बार्टन के पाँव काँप रहे थे। “बस, अब अन्त आ ही गया!" कहकर वह धप्प से जमीन पर बैठ गया।

मैंने एक झटके से डम्बार्टन को खींचकर उठाते हुए कहा, “पागल मत बनो। अभी भी भागने का समय है।"

मुँह से तो मैं बोल गया, लेकिन सामने ही देख रहा था कि मैमथों का झुंड सौ गज के फासले पर आ पहुंचा।


भूकम्प का जोर कुछ घट आया था। फिर से जोरों की थरथराहट शुरू हो गई। उसके साथ ही उन जानवरों का चीत्कार बढ़ गया। पीछे बाइसनों का झुंड दिखाई दिया। कुल मिलाकर वह कैसी जो एक खौफनाक आवाज थी, मैं कहकर नहीं बता सकता।


कुछ दूर तक दौड़कर और आगे नहीं बढ़ सका। ऐसी हालत में बचने की उम्मीद पागलपन के सिवाय और कुछ नहीं। उससे तो अच्छा है, उन हाथियों के पैरों तले रौंदे जाने से पहले उन्हें नजदीक से अच्छी तरह देख लूँ! इसके पहले ऐसा अवसर किसी भी सभ्य आदमी को नहीं मिला होगा!

डम्बार्टन और मैं दोनों ही रुक गए और आगे बढ़ते आनेवाले जानवरों की ओर मुँह करके खड़े हो गए। अब और कितनी देर? बहुत ज्यादा तो बीस सेकंड!


भूकम्प का जोर और ज्यादा बढ़ गया। उससे उन जानवरों में और भी तहलका-सा मच गया। गोया वे यह नहीं ठीक कर पा रहे थे कि किधर को जाएँ। किंकर्तव्यविमूढ़ होकर जिधर-तिधर भाग रहे थे, आपस में ही टकरा रहे थे।


जो दृश्य इसके बाद देखा, वैसा दृश्य मैंने जीवन में कभी नहीं देखा। भविष्य में भी कभी देखूँगा कि नहीं, नहीं जानता! सामने मैमथों का जो झुंड चला आ रहा था, उसके पाँव के नीचे की जमीन जंगल के समानान्तर एक रेखा में प्रायः मीलभर तक फटकर दो भागों में बँट गई। उससे जो विराट खाई-सी हो गई, उसमें नहीं भी तो कुछ सौ हाथी, बाइसन और वह अनाम जानवर चीखते हुए माटी के अन्दर समा गए। बाकी जानवरों ने उलटी दिशा में दौड़ना शुरू किया यानी फिर जंगल की ओर।।

और हम? हमें आखिर इस प्रलयकारी भूकम्प ने ही मौत से बचा लिया।


गुफा के मुँह के पास जाकर देखा, उसके अन्दर जाने का कोई उपाय नहीं रह गया था। छत गिर गई। अन्दर जो कुछ भी था, सब सदा के लिए निश्चिन्त हो गया। रह गए सिर्फ मेरे लिए हुए चित्र ।


दरार से बाहर आकर देखा, मिगुएल भागा नहीं है। लेकिन डर से लगभग अधमरा हो गया है। हमें देखकर खुशी से लिपटकर रो-सा पड़ा!


कोचाबम्बा लौटते हुए डम्बार्टन ने कहा, “समझ रहे हो, हम लोगों ने भी सही नहीं कहा, कार्डोवा ने भी ठीक नहीं कहा। यह गुफा-आदमी है यह अंदाज तो हमारा ठीक है। लेकिन यह भी ठीक है कि उसकी कुछ तसवीरें हाल की आँकी हुई हैं। लिहाजा इसमें कार्डोवा की भूल नहीं है।"


डमबार्टन ने सिर हिलाकर कहा, "यकीन आता है कि लोग पचास हजार साल के केवमैन की बात पर विश्वास करेंगे?"


मैंने हँसकर कहा, “जो हमारे पुराण के सहस्रायु मुनि-ऋषि पर विश्वास करते हैं, कम-से-कम वे जरूर करेंगे।"

Laghu-Kathayen : Trilok Singh Thakurela

  पिताजी एक माह से बीमार थे। उनके व माँ के कई बार फोन आ चुके थे , किन्तु मैं गाँव नहीं जा पाया। सच कहूँ तो मैं छुट्टियाँ बचने के मूड में था।...