सोमवार, 17 जनवरी 2022

आहत पौरुष (कहानी) : आशापूर्ण देवी

 

Aahat Paurush (Bangla Story in Hindi) : Ashapurna Devi

दुबली-पतली और छोटी-सी वायनाकार देह।


रूखा-सूखा चेहरा, तेज नुकीली दाढ़ी-मूंछ और चमड़े से मढ़ा हाड़-पंजर। लेकिन आँखों में सारी दुनिया की पीड़ा और थकान। इस चेहरे को देखकर जवानी जैसे किसी शब्द को इसके नजदीक नहीं लाया जा सकता...और अगर लाया भी गया तो सिर्फ हँसी ही आएगी। छीछालेदर की इस सम्भावना के बावजूद उसने कहा था, "कोई भी काम जब मिलता ही नहीं है चाची...तब काम अच्छा है या बरा, इस बात पर सोचना ही बेमानी है। नौकरों वाला काम ही करूँगा। गले में पडी जनेऊ खोलकर रख दूँगा...और क्या ? ब्राह्मण होने की झूठी अकड़ छोड़नी पड़ेगी। जवानी के दिनों में भी मामा के भरोसे कब तक बैठा-बैठा रोटी तोड़ता रहूँगा।"


तभी उसके मुँह से जवानी की दुहाई देनेवाली बातें सुनकर मैं हँस पड़ी थी। लेकिन दूसरे ही क्षण इसे बड़ी मुश्किल से दबाते हुए मैंने पूछा था, "तुम्हारी उमर कितनी है ?"


उसने जब बताया, “पच्चीस..." तो बेसाख्ता मेरी हँसी निकल पड़ी थी... "दो के ऊपर पाँच...कहीं इसका आँकड़ा उल्टा-पुल्टा तो नहीं हो गया ? कहीं पाँच के ऊपर तो दो नहीं ?"


सचमुच उसने पच्चीस के बदले अपनी उमर बावन बतायी होती तो मैं उस पर यकीन कर लेता। लेकिन मेरी हँसी देखकर वह थोड़ी देर के लिए ठिठक गया। लेकिन मेरे सवाल के पीछे छिपे संकेत को समझकर उसने सिर झुकाकर कहा, “खाने को दो ठो दाना तक नहीं जुटता चाची...इसीलिए शरीर की हालत इतनी खस्ता हो गयी है।...और मामा भी वैसे ही मक्खीचूस..."


अगर मैं उसकी सगी चाची रही होती तो उसकी बातों पर अवश्य ही शर्मिन्दा होती। लेकिन बात कुछ दूसरी ही थी। अपने गाँव-जवार का होने के नाते और पड़ोसी होने की सुविधा के चलते यह दरिद्र ब्राह्मण-सन्तान इस घर के मालिक को शुरू से ही चाचा और मुझे चाची कहता आया है। और तभी से एक नौकरी का जुगाड़ कर देने का विनम्र अनुरोध करता रहा है। उसे तो कुछ ऐसा ही जान पड़ता है कि कलकत्ता महानगर एक कल्पवृक्ष है और उसमें नौकरी रूपी हजारों-लाखों पके और मीठे फल लटके हुए हैं...बस हाथ बढ़ाने की जरूरत है। और जो लोग इतनी ढेर सारी किताबें लिखते हैं उनके लिए किसी छापाखाने में एक नौकरी का बन्दोबस्त करवा देना कौन-सी मुश्किल बात है ? लेकिन यह काम मुश्किल ही नहीं...नामुमकिन है...यह उसकी समझ से परे है।

लेकिन किया क्या जा सकता है ?


किताबें लिख मारनेवाले लेखकों की साख और धाक कितनी होती है, इसे लेखक अच्छी तरह जानते हैं। अगर ऐसी कोई मजबूरी न होती तो उसके लिए नौकरी का जुगाड़ कर देना तो बहुत कुछ मेरे ही हक में होता।


अपने ही गाँव-जवार के और एक पड़ोसी होने के नाते इस छोकरे ने पिछले एक महीने से यहाँ खेमा डाला हुआ है। ऐसा भी नहीं जान पड़ता कि नौकरी न मिली तो वह अपने गाँव लौट जाएगा। इसलिए उसे नौकरी दिलाने की कोशिश में मैंने कोई कोताही नहीं की। लेकिन नौकरी की गुंजाइश भी तो हो कहीं ? दुखिया ब्राह्मण-घर की औरतों और मर्दो का काम है दूसरे के घरों का खाना पकाना और इसी में वे सन्तोष कर लेते हैं। जानी के घर में ही वह पला-बढ़ा है। मामा और मामियाँ भी हैं लेकिन वैसे रसोईघर में क्या कुछ पकता रहता है, कभी मुड़कर नहीं देखा होगा उसने। हमारा निताई भी इसी में राजी था।

तो फिर?


तभी तो उसने यह तय किया है कि जनेऊ उतार दूंगा...और क्या ? “कहूँगा कि निचली जात का लड़का हूँ। जब नौकरी ही करनी है तो इन सारी बातों का रोना-गाना कैसा...? जवानी तो ऐसे ही बीत चली...।"


और तभी...एक नौकरी की खबर मिली थी। घर की चाकरी ही थी। टेलीफोन पर एक सहेली की बेटी ने बताया, “एक नौकर चाहिए मौसी...मिल जाएगा। नौकरानी नहीं...नौकर। जीना दूभर हो गया है..." और कहते-कहते उसका गला रुंध गया था।


निताई पास ही खड़ा था और मैंने रिसीवर पर जो कुछ कहा, वह सुन रहा था। मेरे रिसीवर रखने पर उसने छूटते ही कहा, “ठीक है चाची...मुझे भेज दीजिए।"


मैंने आनाकानी की थी। कहा, "देख निताई, ऐसा है कि उन्हें एक नौकर की जरूरत है। मोटा-मोटा काम करना पड़ेगा। वे तुम्हें जूते झाड़ने को कहेंगे...गन्दे कपड़े साफ करने..."

निताई ने गर्दन झुकाकर कहा था, “सो तो कहेंगे ही चाची...मैं तो यह सब जान-बूझकर ही स्वीकार कर रहा हूँ।"

"देखो बेटे...ऐसा न हो कि अपने मान-सम्मान की बात तुम्हें छू जाए और तुम दुखी हो जाओ। समझ गये न...?"


मैंने देखा कि निताई अपनी बात पर अड़ा है। उसने दृढ़ता से कहा, “अरे नहीं चाची...जब स्वीकार कर लिया तो पीछे क्यों हटने लगा भला ? मुझे पता है जूठे बर्तन भी उठाने पड़ेंगे, जूते चमकाने होंगे...सब करूँगा। दूसरे के गले पड़े रहने से यह काम कहीं कम ही अपमानजनक होगा...है न ?"

मैं कुछ कह नहीं सकी...क्या कहती भला ?


अपनी सहेली की बेटी के अनुरोध की रक्षा कर पाने की खुशी के साथ एक आदमी को खामखाह बिठाकर खिलाने के दायित्व से मुक्ति भी मिली। अपनी छोटी-मोटी पोटली में दो-एक कपड़े समेटकर उसने मुझसे वह पर्ची ले ली, जिस पर घर का नाम-पता लिखा था और काँकुलिया की तरफ रवाना हो गया।


थोड़ी देर के बाद ही मेरी सहेली की बेटी ने अपनी हँसी-खुशी का इजहार करते हुए टेलीफोन पर मुझे धन्यवाद दिया। बोली, “मैं आपका उपकार कैसे भूल सकती हूँ, मौसी... । मैं ही जानती हूँ कि मैं कितनी परेशान थी...।"


मैं मन-ही-मन मुस्करा रही थी। दरअसल बड़े लोगों की तकलीफें भी कुछ ज्यादा ही बड़ी होती हैं। ऐसा न होता तो उसकी गृहस्थी में हैं ही कितने लोग...सिर्फ दो जने। खुद वह और उसका पति...बस। कोई बाल-बच्चा नहीं। लेकिन सुबह...दोपहर...शाम तीनों वेला कोई नौकर सामने न दीख पड़े तो आँखों के सामने अँधेरा-सा छा जाता है। हालाँकि वह चाहे तो डिफ्रिजेडर के भले के लिए ही सही एक दिन सौदा-सुलुफ करके पूरे सप्ताह भर आराम कर सकती है। एक दिन खाना पकाकर दो-तीन दिनों तक खा सकती है।...खाना थोड़ा गरम ही तो करना होगा।


“मैं उसे खाना पकाना सिखा दूँगी...चाची।" कुछ दिनों के बाद शीला की भारी-भरकम आवाज टेलीफोन के तार को झनझनाती गूंज पड़ी। “आपने तो बहुत ही बढ़िया आदमी भेज दिया है चाची... । जरा-सा ना-नुकुर नहीं...बेचारा बक दो...झक दो...चुप रहता है। वैसे इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। इसके पहले वाला तो बड़ा ही शैतान था।...बास्टर्ड..."

बीच-बीच में शीला का फोन आता रहता। शीला वैसे एक आधुनिका नारी है। कहना चाहिए जरूरत से ज्यादा आधुनिका है।


...और इस तरह के आधुनिक समाज में वह एकबारगी सबसे आगे दीख पड़ने की योग्यता भी रखती है। लेकिन माँ और मौसियों के मामले में उसका कुछ दूसरा ही नजरिया रहा है। वहाँ शीला का व्यक्तित्व उसे दूसरों से एकदम अलग कर देता था।


अपने पिछले नौकरों के बारे में उसने जिन-जिन विशेषणों का हवाला दिया उसे टेलीफोन के इस सिरे पर सुननेवाले मेरे कान एकदम दिप उठते थे।


गनीमत यह थी कि ईश्वर की कृपा से मैंने जिस आदमी को उसके पास भेजा था, उससे शीला खुश थी।

निताई भी कम खुश नहीं था।


दो दिनों बाद ही वह मिलने आया था मुझसे। उसकी देह पर हवाई शर्ट और गाढ़े का पायजामा था। हजामत बनी हुई थी और सफाचट चेहरे पर मुस्कान खेल रही थी।


“आपने तो बहुत ही अच्छी जगह काम दिलवा दिया चाचीजी...वे दोनों भी बड़े अच्छे लोग हैं।...और मैंने तो उन्हें कहा तक नहीं...तो भी उन्होंने खुद अपनी इच्छा से ये सारे कपड़े दिये हैं।"

मैं मन-ही-मन हँसती रही।


एक तरफ तो कोई भी छोटी-मोटी नौकरी पाने की चिन्ता में जनेऊ तक उतारकर रख देने की तैयारी और दूसरी तरफ ब्राह्मण का बेटा होने के बावजूद दूसरों के उतारे पुराने कपड़े पहन लेने में जरा भी शरम नहीं।

ठीक ही कहा गया है भात के आगे कैसी जात !


निताई के स्वर में उसकी खुशी झलक रही थी..."चाची माँ, क्या बताऊँ ? खाना-पीना सब एकदम फर्स्ट क्लास है। वे जो खुद खाते हैं, वही मुझे भी खिलाते हैं। इसे ही कहते हैं...ऊँचा आचार और ऊँचा व्यवहार । मैं भी यही सोचता हूँ कि जिन्हें हम अपने पिता या गुरु की तरह मानते हैं उनसे भला इतनी दूरी कैसी ? जात-पाँत का और छुए जाने का इतना विचार क्यों ? ऐसे कैसे चलेगा ? इससे तो हमारा भी नुकसान है और उनका भी। और वे दोनों खाते भी कितना हैं...बस दुनिया भर की अच्छी-अच्छी चीजें लाकर ढेर लगा देते हैं। ऐसा लगता है कि वे सामान लाते हैं...जमा करते हैं और फिर फेंक देते हैं या फिर मुझसे कहते हैं, निताई सुन...वह सब हम नहीं खाएंगे अगर तुझे खाना है तो खा ले।...केक...पेस्ट्री और न जाने क्या-क्या ? मैं तो उन सबके नाम भी नहीं जानता।"


मुझे उसकी बातें सुनकर हँसी भी आती और दुख भी होता। मैं यही सोचती कि जिसे ब्राह्मण वंश के होने का इतना गर्व था और जो यहाँ तक कह रहा था जनेऊ खोलकर रख दूंगा...वही...अब बिना किसी हिचक के जूते झाड़ रहा है...जूठा खा रहा है।

जाने भी दो...मुझे खामखाह के झमेलों में पड़ना न पड़े...यही बहुत है। लेकिन फिर भी मेरा जी कुछ उचाट-सा रहा।

"...ठीक है...जी लगाकर काम करना,” मैंने कहा, "बस दो ही तो प्राणी हैं। जो करना है तुझे ही करना है। बस इसी तरह..."


निताई ने ठहाका लगाते हुए कहा, “आपको कहना न होगा चाची...भैया और भाभी जी तो कभी भूलकर भी नहीं देखते। जो करता हूँ मैं ही करता हूँ।"

मुझे सन्तोष हुआ।


उधर शीला का सुरीला संवाद सुनने को मिलता रहता था, “मैं तो आपको दोनों वेला प्रणाम करती रहती हूँ मौसी ! काम करने का सलीका हो तो ऐसा। मुझे तो अपनी गृहस्थी की तरफ नजर उठाकर देखने की जरूरत तक नहीं पड़ती। निताई ही सौदा-सुलुफ ले आता है, बाजार जाता है...आज खाने में क्या बनेगा...सब उसी के जिम्मे रहता है..."


मैं यही सोचती रही कि चलो कहीं तो कोई फर्क पड़ा। लोगों के लिए नौकर या रसोइये जुटा देना अथवा किसी के ब्याह के लिए कहीं कोई जुगाड़ भिड़ा देना तो आये दिन लगा ही रहता है लेकिन अब तक कहीं से किसी का धन्यवाद नसीब नहीं हुआ था। शिकायतें और उलाहने ही मिलते रहे हैं अब तक उपहार में। निताई की सादगी उसकी मजबूरी और थोड़े में ही खुश हो जाने की तैयारी ने मेरी इज्जत रख ली है।


निताई तो ऐसा ही था...लेकिन ऐसा रह नहीं पाया।

और मैं उसी बात पर आती हूँ।


आज दोपहर को...जब मैं खा-पीकर हाथ में कहानी की एक किताब लेकर पढ़ रही थी और लगा कि नींद आ रही थी...अचानक...मैंने देखा कि निताई अपने हाथ में अपनी वही पुरानी पोटली लेकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ है।

"क्या बात है निताई...कैसे हो...?" मैंने पूछा।


निताई की भोली-भाली सूरत और सहमी-सहमी आँखों में जैसे चिनगारियाँ फूट रही थीं। सिर झुकाकर खड़ा रहने और अंगूठे से जमीन कुरेदने वाली चिर-परिचित मुद्रा से अलग-थलग जान पड़नेवाला निताई आज एकदम सीधा खड़ा रहा।


“क्या हुआ ? सारे कपड़े-लत्ते लेकर चले आये तुम ?"

"मैं अब वहाँ काम नहीं करूँगा।" उसने साफ-साफ बता दिया।

मैं हैरान। ऐसा जान पड़ा कि सरगम में बँधे सितार का एक तार अचानक झनझनाकर टूट गया और...सारे स्वर बिखर गये।

दोनों ही पक्ष के मन में परस्पर भरोसा और एक-दूसरे के लिए इतना आभार...यह अचानक क्या हुआ ?

मैंने उससे जानना चाहा।

पर निताई चुप रहा।


ऐसा जान पड़ा कि वह किसी कारणवश अपमानित हुआ है। नौकर-चाकर की जात ही ऐसी होती है। हजार बार अच्छा काम करो...बढ़िया स्वभाव बनाये रखो लेकिन जरा-सा गाँठ पड़ गयी कि नौकरी से जवाब। निताई कोई भूखा तो नहीं मर रहा था लेकिन उसकी ऊबड़-खाबड़ हाड़-पंजर की खाल जरूर भर रही थी।


मैं अपनी झूँझल को रोक न पायी। मैंने फिर पूछा, "आखिर हुआ क्या...? बक-झक। यह तो तुम्हें पता होना चाहिए बेटे कि अगर गलती करोगे तो झाड़ पड़नी-ही-पड़नी है। आखिर कौन है जो सब सहता जाएगा...आखिर तुम्हारे कोई सुरखाब का पर नहीं जड़ा। अभी उस दिन तो तुम बता रहे थे कि सब कुछ बड़ा शानदार है...और अचानक...कोई बात हो भी गयी तो..."

"नहीं चाची..." निताई इस बार अपनी जुबान खोले बिना नहीं रह सका..."उनकी बातचीत का ढंग तो बहुत ही अच्छा है!"


"तो फिर ? क्या काम बहुत ज्यादा था...? घर-गिरस्ती का काम भी कहीं नाप-जोख से होता है...एक दिन कुछ कम होता है तो फिर दूसरे दिन ज्यादा भी हो जाता है..."


निताई ने मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा, “बात यह नहीं थी चाची...काम कोई ज्यादा नहीं था। आपके आशीर्वाद से निताई इस कमजोर शरीर से भी घोड़े दौड़ा सकता है...।"

मैं हैरान थी। “तो काम छोड़ने के पीछे बात क्या थी ?..." मैंने पूछा।


सिर झुकाये निताई के चेहरे की मांस-पेशियाँ एक बार फिर उभर गयीं। उसकी आवाज जैसे खनक रही थी, “वहाँ मेरी मान-मर्यादा को खतरा था।"


मान-मर्यादा ? मैं उसकी बात सुनकर सकते में आ गयी। कोई बक-झक नहीं तो फिर मान-मर्यादा जैसी वह कौन-सी चीज थी, जिसकी उँगली पकड़कर निताई भाग खड़ा हुआ। मैंने उसकी बात को दोहराते हुए कहा, “तुम्हीं तो कह रहे हो कि ऐसी कोई बक-झक या झड़प नहीं हुई तो आखिर वह कौन-सी हवाई चिड़िया थी जिसके पंखों पर तुम्हारा सारा मान-सम्मान सवार होकर उड़ गया...फुर्र-से ?"

निताई फिर अपनी जानी-पहचानी मुद्रा में लौट गया। उसने सिर झुकाये-झुकाये ही कहा, “मैं आपको नहीं बता सकता, चाची !"

नहीं बता सकता...यह भला क्या बात हुई।


मैं अपनी सहेली की बेटी शीला को जानती थी। यह ठीक है कि वह थोड़ी शोख है, जरा घमण्डी भी है लेकिन... । खैर...मैंने भी कुछ तय कर लिया था। मैंने उससे पूछा, “देख निताई, बिना बताये तो बात बनेगी नहीं। अगर तुम किसी के सिर बेवजह कोई दोष मढ़ दो और काम छोड़ दो तो मैं शीला को क्या जवाब दूंगी ? मुझे तो अभी तुरत उससे पूछना पड़ेगा कि आखिर बात क्या हुई ?"


निताई ने अपनी गर्दन को सिकोड़े-सिकोड़े जवाब दिया, "कह दीजिएगा, अचानक अपनी नानी के गुजर जाने की खबर पाकर वह गाँव चला गया।"

"वाह ! यह बात तो तुम्हीं उन्हें बताकर आ सकते थे। इसमें न बताने जैसी कोई दबी-छिपी बात तो नहीं है।"

“तो फिर आपके जी में जो आए...वही कह दीजिएगा।"


मुझे बड़ा गुस्सा आ गया। मुझे सारी बातें मंजूर हैं, पर यह बहानेबाजी जरा भी पसन्द नहीं। मैंने उसे धमकाते हुए कहा, “ये सब बेकार की बातें हैं। तुम्हारा लम्बा-चौड़ा और बेशकीमती मान-सम्मान आखिर किस बात से धूल में मिल गया...यह तुम्हें बताना ही होगा।"


निताई ने एक बार फिर आनाकानी की। ऐसा जान पड़ा कि उसके स्याह पड़ गये दोनों कमजोर होठ एक बार कँपे। उसकी आवाज सहमी हुई थी, "वे दोनों बहुत ही अच्छे हैं चाची...बहुत ही अच्छे। लेकिन वे मुझे आदमी नहीं समझते शायद । मैं भले ही गरीब...अनाथ और मूरख हूँ लेकिन कोई बच्चा तो नहीं। आखिर पच्चीस साल का जवान आदमी हूँ...वे दोनों औरत-मर्द का सारा खेल मेरे सामने ही...।"


कुछ बताने के पहले उसके होठ चुप हो गये। ऐसा लगा कि उसकी आवाज चुक गयी। मैं भी खामोश हो गयी। कहना चाहिए स्तब्ध रह गयी।


इस बीमार और कमजोर-सी लगनेवाली छोटी-सी बौनी आकृति से मैं आँख न मिला पायी। सारा कुछ बड़ा ही अजूबा और अनोखा जान पड़ा। अविश्वसनीय भी। लेकिन तो भी...मुझे यह जान पड़ा कि उसने कहीं कोई जख्म जरूर खाया है।


एक ब्राह्मण की सन्तान होते हुए भी वह नौकर का काम कर सकता है...जूठा खाना खा सकता है...दूसरों के उतारे पुराने कपड़े पहन सकता है...इसमें उसकी कोई मान-हानि नहीं होती...उसकी मर्यादा तो तब भंग होती है जब उसकी जवानी की अनदेखी और अवहेलना की जाती है।


अपने को एक जवान आदमी के रूप में प्रस्तुत कर पाने की निताई की कोशिश पर आज मेरी हँसी नहीं छूटी।...और मैं उसके आहत पौरुष की तरफ आँख उठाकर देख न पायी।


मुझे ऐसा जान पड़ा कि स्याह आँसू चुहचुहा रहे हैं...उसकी आँखों में... सुलगते और...खौलते आँसू ।


(अनुवाद : रणजीत कुमार साहा)

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